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क्रांतिकारियों का गांव है अस्करीपुर

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नूरपुर में शहीद परवीन सिंह व रिक्खी सिंह की स्मृति में बना शहीद स्थल। - फोटो : BIJNOR
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क्रांतिकारियों का गांव है अस्करीपुर
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- आजादी की लड़ाई और प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए गांव के नौजवान
अनिल यादव
नूरपुर। क्षेत्र के गांव अस्करीपुर को क्रांतिकारियों का गांव कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस गांव के एक नौजवान ने जहां आजादी के आंदोलन में शहादत दी थी, वहीं प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार की ओर से जर्मनी के विरुद्ध युद्ध लड़ते हुए भी इस गांव के एक जवान ने अपनी जान दी थी। प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले जवान की इस शहादत को दर्शाता हुआ शिलालेख आज भी गांव के प्राथमिक स्कूल में लगा हुआ है।
नूरपुर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित ग्राम अस्करीपुर की आबादी करीब 10 हजार है। 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर तिरंगा झंडा फहराने के दौरान पुलिस द्वारा चलाई गई गोली से इस गांव के रिक्खी सिंह शहीद हो गए थे। उनके साथ गांव गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह भी शहीद हुए थे, जबकि गांव ढेली अहीर निवासी मुंशी सिंह घायल हुए थे। पूर्व ग्राम प्रधान योगेश शर्मा बताते हैं कि नूरपुर कांड के बाद पुलिस ने गांव में जमकर तांडव मचाया था। पुलिस द्वारा ग्रामवासियों को मारा पीटा जाता था। पुलिस के भय से गांव के सभी नौजवान फरार हो गए थे। पुलिसकर्मी उस समय घोड़ों पर सवार होकर आते थे और जो भी उन्हें मिलता था, उसे ही उठाकर ले जाते थे।
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उनके पिता यज्ञदत्त शर्मा को पुलिस बीमारी की हालत में चारपाई समेत उठाकर थाने ले गई थी। बाद में थाने में उनकी हालत बिगड़ने पर वापस गांव छोड़ गई। हरस्वरूप सिंह, मेघराज सिंह, सुखदेव सिंह, कल्लू सिंह दीवान जी को पकड़कर सेंट्रल जेल आगरा भेजा गया था। दलजीत सिंह को छह महीने तक किसी अज्ञात जेल में रखा गया था। इंदर सिंह, पंडित यज्ञदत्त शर्मा भी जेल भेजे गए थे। गांव पर सामूहिक जुर्माना भी लगाया गया था।
1914 से 1919 तक हुए प्रथम विश्व युद्ध मेें भी गांव के 10 व्यक्तियों ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर जर्मनी के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। इनमें से एक व्यक्ति की युद्ध में मौत हो गई थी। हालांकि काफी खोजबीन के बाद भी विश्वयुद्ध में भाग लेने वाले और मरने वालों के नाम और उनके परिजनों के संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी, लेकिन इस जानकारी को दर्शाता हुआ शिलालेख गांव के प्राथमिक विद्यालय में लगा हुआ है। पूर्व प्रधान योगेश शर्मा के मुताबिक उक्त शिलालेख ब्रिटिश सरकार की ओर से गांव को दिया गया था। काफी दिनों तक वह ऐसे ही रखा रहा। बाद में उसे विद्यालय की दीवार पर लगवाया गया।
परवीन सिंह की पत्नी ने नहीं की थी दूसरी शादी
परवीन सिंह और रिक्खी सिंह की शादी हो चुकी थी। अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह के एक पुत्र रामस्वरूप सिंह थे, जो पिता की शहादत के दौरान चार साल के थे। परवीन सिंह की शादी हुई थी और उनका गौना नहीं हुआ था। परवीन सिंह की विधवा स्वरूपदेई ने दूसरी शादी नहीं की और वह तभी से अपने मायके स्याऊ में रहती थीं। करीब पांच वर्ष पूर्व उनकी मौत हो चुकी है। वहीं रिक्खी सिंह के एकमात्र पुत्र रामस्वरूप सिंह की भी एक वर्ष पूर्व मौत हो चुकी है।
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16 अगस्त को लगता है मेला
नूरपुर। जंगे आजादी में जहां पुलिसकर्मियों द्वारा आजादी के सिपाहियों पर की गई गोलीबारी ने दो युवाओं को मौत की नींद सुला दिया वहीं आजाद भारत में एक पुलिसकर्मी ने उनकी याद में शहीद स्थल का निर्माण करा मिसाल कायम की है। थाने के सामने बने शहीद स्थल पर 16 अगस्त को प्रत्येक वर्ष शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। नूरपुर थाने पर 16 अगस्त 1942 को हुई गोलीबारी में शहीद हुए परवीन सिंह व रिक्खी सिंह की याद में वर्ष 1997 में तत्कालीन एसओ वेदप्रकाश सिंह ने थाने के बाहर खाली पड़ी जमीन पर शहीद स्थल का निर्माण कराया था। तत्कालीन जिलाधिकारी मामराज सिंह व एसपी कमल सक्सेना ने 16 अगस्त 1997 को इसका उद्घाटन किया था।
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