भारतीय कालीन संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के मुताबिक अमेरिका, भारतीय कालीनों के व्यापार में करीब 60 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। देशभर में करीब 17 हजार करोड़ रुपये का कालीन कारोबार होता है। इसमें 10 हजार करोड़ का कारोबार उत्तर प्रदेश और उसमें भी छह हजार करोड़ की हिस्सेदारी भदोही-मिर्जापुर परिक्षेत्र की है।
सबसे अधिक रोजगार मुहैया कराने वाले कालीन उद्योग से जुड़े मजदूरों पर अमेरिकी टैरिफ से संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ (एकमा) के मुताबिक कालीन उद्योग देश भर में करीब 30 लाख लोगों को रोजगार देता है। भदोही के तो लगभग हर घर में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लोग इसमें जुड़े हैं।
एकमा अध्यक्ष रजा खां के मुताबिक कालीन तैयार करने के लिए 20 चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। इसमें कच्चे माल की खरीदारी से लेकर कालीन की फिनिशिंग तक के कार्य शामिल हैं। बताया कि विदेश से कच्चा माल मंगाने के बाद छंटाई, लेफा, एक्सप्लोर से खरीदारी, मजदूरों से कताई, रंगाई, डिजाइनिंग, बुनकरी, आवश्यकता पड़ने पर मरम्मत, क्लिपिंग, धुलाई, फिर से क्लिपिंग, पेंचाई, सफाई, रंगकटा कार्य होते हैं। इसमें भी खुलाई, पेंचाई, लेफा और काती बुनाई का काम अधिकतर महिलाएं ही करती हैं। इससे उन्हें घर बैठे ही रोजगार मिल जाता है।
एकमा के मानद सचिव पीयूष बरनवाल के मुताबिक अमेरिकी टैरिफ से इस समय देशभर में करीब 1500 करोड़ का माल डंप है। इसमें 500 करोड़ का माल भदोही-मिर्जापुर परिक्षेत्र का है। फिलहाल नए आर्डर नहीं लिए जा रहे हैं। पूरा उद्योग इस समय अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। बताया कि टेक्सटाइल के अन्य उत्पादों की अपेक्षा कालीन उद्योग तत्काल प्रभावित होने वाला उद्योग है, क्योंकि यह करीब 95 फीसदी तक एक्सपोर्ट होता है। ऐसे में पूरा उद्योग इस समय सदमे में है।