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दादा-पोते ने हिला दी अंग्रेजी हुकूमत की चूलें

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दादा-पोते ने हिला दी अंग्रेजी हुकूमत की चूलें
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चौरी (भदोही)। आजादी की दीवानगी के आगे बर्तानिया हुकूमत के जुल्म-ओ-सितम को फीका साबित करने वाले क्रांतिकारियों की भदोही जिले में लंबी फेहरिस्त है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी मिलने तक जिले के अनेक शूरवीरों ने आने वाली पीढ़ी को आजाद देश की आबोहवा में सांस लेने का सुख देने के लिए जान की बाजी लगा दी थी। इन्हीं में से थे चौरी इलाके के बेदमनपुर रोटहा गांव निवासी हरिवंश दुबे और श्रीराम दुबे। आज उनका परिवार साधारण जीवन व्यतीत कर रहा है।
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देश को आजाद कराने में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत पर कितनी संजीदगी दिखाई जा रही है, इसका अंदाजा उनके वंशजों के जीवन स्तर से लगाया जा सकता है। एक ही परिवार के दो स्वतंत्रता सेनानी होते हुए भी उनके परिवारीजन उपेक्षित हैं। भदोही जिले में चौरी इलाके के बेदमनपुर (रोटहा) निवासी स्वतंत्रता सेनानी हरिवंश दुबे ने 1857 में गदर के दौरान अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। आजादी के लिए रेलवे लाइन उखाड़ने से लेकर उन्होंने सरकारी संपत्ति को भारी क्षति पहुंचाई। विद्रोह की आग को इतना भड़काया कि अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिल गईं। बौखलाए अंग्रेजों ने हरिवंश दुबे को गिरफ्तार कर लिया। आनन-फानन में अंग्रेजी हुकूमत ने 11 अगस्त को उनको फांसी की सजा मुकर्रर कर दी गई। उनको ज्ञानपुर में फांसी पर चढ़ाने की तैयारी होने लगी लेकिन, अंग्रेजों में पैठ बनाने वाले सुदर्शन लाला के प्रयास से ऐन वक्त पर फांसी स्थगित कर दी गई। अपने दादा हरिवंश दुबे की राह उनके पोते श्रीराम दुबे भी चल पड़े। 1942 में मुंबई महाधिवेशन में जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने करो या मरो का नारा दिया तो समूचा देश जल उठा। राष्ट्रपिता के आह्वान के साथ ही क्रांतिकारी श्रीराम दुबे मुंबई से सीधे घर के लिए रवाना हो गए। घर पहुंचकर श्रीराम दुबे ने अपने साथियों संग परसीपुर रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया। मुगलसराय से प्रतापगढ़ के बीच एकमात्र परसीपुर स्टेशन को स्वतंत्रता सेनानियों के फूंक देने से अंग्रेजी सरकार बौखला गई और उनकी गिरफ्तारी की जीतोड़ कोशिशें शुरू हो गईं। वाराणसी में भी श्रीराम दुबे को गिरफ्तार करने का प्रयास किया गया लेकिन वह अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे। लंबी मशक्कत के बाद भी अंग्रेज श्रीराम दुबे को गिरफ्तार करने में नाकाम रहे। देश को आजादी मिलने के बाद श्रीराम दुबे ने स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली पेंशन को यह कहकर ठुकरा दिया कि जिस माटी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, उन भावनाओं की कोई कीमत नहीं हो सकती लेकिन अफसोस कि दो-दो क्रांतिकारियों के परिवार को आज तक सरकार की ओर से कोई लाभ नहीं मिल पाया। क्रांतिकारियों के नाम पर कोई स्मारक न होने का मलाल उनके परिवारीजनों को अब भी है।
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