पीलीभीत। देश में 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था। इसके बावजूद वह सत्ता के विरोध की ज्वाला को शांत नहीं कर पाई थीं। उस दौर में पीलीभीत एक ऐसा शहर था जहां इमरजेंसी के खिलाफ आक्रोश उभरकर सामने आया था। जनसंघ और आरएसएस के कई दिग्गज नेता शहर में आए थे। आंदोलन की रणनीति बनाई थी। असर यह हुआ कि लोग झुके नहीं बल्कि जेल गए और तत्कालीन सरकार की लोकतंत्र विरोधी नीति का मुखर विरोध किया।
इमरजेंसी लागू होने के बाद अगले ही दिन 26 जून को चुनिंदा लोगों की एक छोटी सी बैठक विद्यार्थी परिषद के तत्कालीन पदाधिकारी विश्वमित्र टंडन (अब वरिष्ठ पत्रकार) के निवास पर हुई थी। उस वक्त शहर सरकार विरोधी नारों से पटा पड़ा था और प्रशासन बौखला उठा था। जनसंघ और आरएसएस के नेताओं को ढूंढ ढूंढकर पकड़ा जा रहा था। पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के तत्कालीन विधायक धीरेंद्र सहाय की सबसे पहली गिरफ्तारी 27 जून को सुबह उस वक्त की गई जब वह अपने घर के लॉन में बैठे चाय पी रहे थे। पुलिस ने उनके घर को घेर लिया था। धीरेंद्र सहाय इतने सह्रदय थे कि उन्होंने गिरफ्तारी करने आए दरोगा को भी चाय पिलाई और फिर पुलिस के साथ कोतवाली आ गए।
पीलीभीत जेल में कुछ महीने रखने के बाद उन्हें लखनऊ जेल में शिफ्ट कर दिया गया। बाद में उन्हें जमानत मिल गई। अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया। उनके बड़े भाई उन्हें घर लाने के लिए जेल पहुंचे लेकिन तब तक प्रशासन की ओर से उन पर मीसा लगा दिया गया। वह जेल में ही रहे। इमरजेंसी समाप्त होने के बाद उनकी रिहाई हो पाई थी। धीरेंद्र सहाय ने इमरजेंसी में यातनाएं सहीं। वे ऐसी थीं कि 25 जून 2017 को शहर में आयोजित एक समारोह में उसका जिक्र करते-करते उनकी आंखें छलक उठीं थीं। अच्छी बात यह थी कि जनता की सहानुभूति उनके साथ जुड़ी और 1977 में वह जनता पार्टी के टिकट पर शहर से दूसरी बार विधायक बने। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनाए गए। 91 वर्ष की उम्र में नौ अप्रैल 2020 को उनका स्वर्गवास हुआ। जब लोग उन्हें याद करते है तो इमरजेंसी के दौर की यादें भी ताजा हो जाती हैं।