घर ले गए रावण की अस्थि
अंत में रावण व लंका के अवशेष के रूप में राख में बची लकड़ियों के टुकड़ों को लोग घर ले गए। आचार्य मुकेश मिश्रा ने बताया कि इसके पीछे मान्यता है कि रावण के वध और लंका विजय के प्रमाण स्वरूप श्रीराम की सेना लंका की राख अपने साथ ले आई थी। इसी के चलते रावण के पुतले की अस्थियों को घर ले जाने का चलन शुरू हुआ।
इसके अलावा मान्यता यह भी है कि धनपति कुबेर की बनाई लंका की राख तिजोरियों में रखने से घर में स्वयं कुबेर का वास होता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही कारण है कि आज भी रावण के पुतले के जलने के बाद उसके अस्थि-अवशेष को घर लाना शुभ माना जाता है। इससे नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश नहीं करती हैं।
धू-धू कर जला रावण
उत्तराखंड सांस्कृतिक समाज की ओर से राजेंद्रनगर में मंगलवार को राम-रावण युद्ध लीला का मंचन किया गया। अंत में श्रीराम ने रावण का वध कर दिया। इस मंचन को देख भक्तों ने खूब तालियां बजाईं। पूरा पंडाल श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। इस दौरान गोकुलनंद पाठक, त्रिलोक भाकुनी, नवल पाठक, कैलाश पंत, कैलाश पांडे, हरीश भट्ट का सहयोग रहा।
बीआई बाजार उज्ज्वल कॉलोनी में पर्वतीय समाज की रामलीला में अंगद-रावण संवाद, कुंभकर्ण, मेघनाद व रावण वध की लीला का मंचन किया गया। इससे पूर्व मेधावी छात्रों को सम्मानित किया गया। लीला का शुभारंभ डॉ. दीप पंत ने किया। इस दौरान समाज के अध्यक्ष गिरीश चंद्र पांडे, उपाध्यक्ष मदन सिंह बिष्ट, महासचिव नरेंद्र सिंह बिष्ट, सचिव चंद्र,प्रकाश जोशी उपस्थित रहे।