बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों के लिए गरीबों के बच्चों की पढ़ाई के क्या मायने हैं, फतेहगंज पश्चिमी का मॉडल प्राइमरी स्कूल फर्स्ट देखकर इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। मानकों की धज्जियां उड़ाकर पांच जर्जर कमरों के इस स्कूल में सर्वाधिक 31 शिक्षकों की तैनाती तो कर दी गई लेकिन फिर भी कक्षाएं बगैर शिक्षक के चल रही हैं।
फतेहगंज पश्चिमी के मॉडल प्राइमरी स्कूल में 31 शिक्षकों की तैनाती का मामला सुर्खियों में है। इस स्कूल में सिर्फ 582 बच्चों का नामांकन है लिहाजा शिक्षकों की यह संख्या मानकों से कई गुना ज्यादा है। बच्चों की बदकिस्मती यह है कि स्कूल में इसके बावजूद पढ़ाई नहीं हो रही। बुधवार को अमर उजाला की टीम ने स्कूल का जायजा लिया तो साफ हो गया कि विभाग के अफसरों ने गरीबों के बच्चों की शिक्षा को किस हद तक खिलवाड़ बना रखा है।
कक्षाओं में कैद गिनती के बच्चे, स्टाफरूम में गपशप में मशगूल मिले शिक्षक
स्कूल में तैनात 31 शिक्षकों में से ज्यादातर पहुंचे तो थे लेकिन कक्षाओं में पढ़ाने के बजाय स्टाफ रूम में बैठे गपशप में मशगूल दिखाई दिए। कक्षाओं में बच्चों की संख्या काफी कम थी, ऊपर से उन्हें पढ़ाने वाला भी कोई नहीं था। 582 नामांकन होने के बावजूद किसी भी कक्षा में बच्चों की संख्या 10-15 से ज्यादा नहीं थी। कुल मिलाकर 50-60 बच्चे ही स्कूल आए थे जो कक्षाओं में कैदी की तरह बैठे हुए थे। पूछने पर शिक्षकों ने बहाना बनाया कि उन्होंने बच्चों को काम दे दिया है। इसके बाद स्कूल की कमियां गिनाने में जुट गए। बोले, वे खुद नहीं जानते कि फिजूल में अफसरों ने इतनी ज्यादा संख्या में शिक्षकों की तैनाती इस स्कूल में क्यों कर दी है। वे तो कई बार अफसरों से जरूरत के मुताबिक किसी दूसरे स्कूल में अपनी तैनाती करने की मांग भी कर चुके हैं।
पूरी इमारत जर्जर, फिर भी पांच कमरों के स्कूल में आठ कक्षाएं चलाने का दावा
स्कूल में चार कमरे भूतल और एक कमरा ऊपर बना है। ऊपर बना कमरा अपेक्षाकृत ठीकठाक है। बाकी चारों कमरों में हर तरफ प्लास्टर उधड़ा पड़ा था। शिक्षकों का कहना था कि स्कूल की कक्षाओं में बैठने का सीधा मतलब अपनी और बच्चों की जान को खतरे में डालना है। विभागीय अफसरों को कई बार लिखा जा चुका है। दो साल पहले एसडीएम को भी लिखा गया था, लेकिन किसी अधिकारी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। बारिश के दिनों कमरों में ही नहीं, शौचालयों में भी पानी टपकता है। छत से प्लास्टर के थपड़े टूटकर गिरते हैं। यह पूछने पर पांच कमरों के स्कूल में आठ कक्षाएं कैसे चलाते हैं, शिक्षकों ने चुप्पी साध ली। बता दें कि अफसरों के दावे के मुताबिक स्कूल में प्राइमरी कक्षाओं में 443 और जूनियर कक्षाओं में 138 बच्चों का नामांकन है। हालांकि स्कूल में छठी से आठवीं तक की एक भी कक्षा चलती नजर नहीं आई।
फर्जीवाड़े की हद, पिछले ही साल, स्कूल का किया था कायाकल्प
बेसिक शिक्षा विभाग में चलने वाली सरकारी योजनाओं में किस कदर भ्रष्टाचार है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कदम-कदम पर खस्ताहाल दिखाई देने वाले इस स्कूल का नगर पंचायत की ओर से पिछले साल ही कायाकल्प कराने का दावा किया गया था। स्कूल के शिक्षकों ने बताया कि कायाकल्प योजना के तहत स्कूल के फर्श पर ही थोड़ा-बहुत काम कराया गया। बाकी स्कूल को जैसे का तैसा छोड़ दिया गया।
ऐसे स्कूल बनाए जाते हैं मॉडल
1. ऐसा स्कूल जिसमें छात्रों और शिक्षक का अनुपात बेहतर हो।
2. स्कूल में पढ़ाई के साथ बच्चों के लिए अतिरिक्त गतिविधियां भी होती हों।
3. कायाकल्प योजना के तहत स्कूल में बेहतर काम किया गया हो।
4. बच्चों को पढ़ाई गई चीजें बाद में भी पता हों और याद भी रहें।
5. गुणवत्ता टेस्ट में खरे उतरने पर ही शिक्षकों की मॉडल स्कूल में होती है तैनाती।