कुछ कारखाने भी खुलने लगे, कारीगरों की होने लगी वापसी
बरेली। कोरोना से चौपट हुआ बरेली का जरी कारोबार अब धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने लगा है। कारोबारी हालात में सुधार होने से कारीगर भी खुश हैं। एक तरफ जहां माल का उठान बढ़ा है, वहीं जरी कारीगर भी अपने काम पर लौटने लगे हैं। हालांकि अभी स्थिति कोराना काल से पहले जैसी तो नहीं हुई है, लेकिन काम में चार महीने में 20 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हो गया है।
जरी का कारोबार कोरोना काल में लगभग डूब सा गया था। हालत ये हो गई कि काम घटकर 15-20 प्रतिशत ही रह गया था। एक डेढ़ साल से मंदी की मार झेलने के बाद जरी कारोबार अब कुछ रफ्तार पकड़ रहा है। बंद पड़े कारखाने भी अब खुलने लगे हैं, लेकिन अभी तक 30-35 प्रतिशत कारखाने ही खुल पाएं हैं। कारीगर भी धीरे-धीरे कारखानों में आने लगे हैं। कारखाने बंद हो जाने पर कारीगरों ने जरी का काम छोड़कर सब्जी और फल के ठेले लगाने या ई-रिक्शा चलाने शुरू कर दिए थे।
कारोबारी बताते हैं कि एक बार तो लगने लगा था कि अब जरी कारोबार कभी पटरी पर नहीं लौट पाएगा, लेकिन जैसे जैसे कोरोना के हालात बेहतर होते जा रहे हैं, काम भी बढ़ रहा है। हालांकि अभी स्थिति बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। तीसरी लहर का भी लोगों में बना हुआ है। वे चिंतित हैं कि कहीं फिर से लॉकडाउन की स्थिति आई तो इस बार जरी कारोबार की कमर ही टूट जाएगी। फिलहाल दिल्ली और पंजाब ने कुछ काम संभाला है। जयपुर से अभी न के बराबर ही काम शुरू हो पाया है।
- उत्तर प्रदेश बुनकर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मुख्तार अंसारी का कहना है कि अभी हालात बहुत बेहतर नहीं कहे जा सकते हैं। अलबत्ता काम में कुछ उठान जरूर आया है। जो कारखाने कोरोना काल में बंद हुए थे, उनमें से अभी 30 प्रतिशत ही खुल सके हैं। जिन कारोबारियों ने अपने कारखाने खोल लिए हैं वे जमापूंजी से ही लागत लगा कर माल स्टोर कर रहे है। अब दिल्ली से ऑर्डर के लिए सैंपल मंगाए जा रहे हैं। इससे उम्मीद है कि आगे हालात बेहतर होंगे।
- कारीगर मेराज अहमद का कहना है कि लगभग डेढ़ साल के बाद थोड़ा बहुत काम बढ़ा है। फिलहाल दिल्ली से काम की मांग हो रही है। इसमें शाल कढ़ाई के ज्यादा ऑर्डर हैं। थोड़ा बहुत सूट और दुपट्टे का काम भी मिल रहा है। स्थिति ठीक होते देख काम पर लौट आएं हैं। फिलहाल पुरानी नफरी पर ही काम कर रहे हैं। कोरोना काल में काम बंद होने के बाद स्थिति बहुत खराब हो गई थी। तब घर चलाने के लिए सब्जी का ठेला लगाने लगे थे।
- महिला कारीगर अंजुम का कहना है कि अभी तक तो काम की हालत बहुत खराब थी। घर चलाना मुश्किल हो रहा था। बस जैसे तैसे काम चलता रहा। पति रिक्शा चलाते थे, उसी से घर का गुजारा होता था। अब काम थोड़ा चला है। वह और उनकी बेटियां काम करती हैं। कोरोना काल में सभी खाली बैठे थे। जो जमापूंजी थी वह भी खर्च हो गई। फिर कोरोना फैल सकता है यह डर तो है, मगर दिल्ली से काम मिलना शुरू होने के बाद आगे स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद बंधी है।