विधानसभा चुनाव से ऐन पहले बीडीए की रामगंगा आवासीय परियोजना के लिए 12 गांवों में जमीन के अधिग्रहण का मामला सियासी मुद्दा बनते देख प्रशासन ने अपने कदम पीछे खींच लिए। कमिश्नर के निर्देश पर इटौआ गांव में किसानों की पंचायत में पहुंचे एसडीएम सदर ने एलान कर दिया कि किसानों की मर्जी के बगैर उनकी एक इंच जमीन भी नहीं ली जाएगी।
बीडीए की रामगंगा आवासीय परियोजना के लिए प्रशासन की ओर से 12 गांवों में किसानों की जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी लेकिन किसान जमीन देने को तैयार नहीं हैं। अधिग्रहण प्रक्रिया के विरोध में सोमवार को किसानों ने कमिश्नरी का घेराव कर कई घंटे तक प्रदर्शन कर एलान किया था कि वे किसी भी हालत में आवासीय परियोजना के लिए अपनी जमीन नहीं देंगे।
मंगलवार को भारतीय मजदूर किसान राष्ट्रवादी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मुन्नालाल मिश्रा के नेतृत्व में डोहरा के गांव इटौआ में आयोजित किसान सम्मेलन में तय किया गया कि हर गांव के पांच-पांच किसान बृहस्पतिवार को कमिश्नर से मिलकर जमीन के जबरन अधिग्रहण का विरोध करेंगे। कमिश्नर से बात करने के लिए बृहस्पतिवार को मुख्यालय आने से पहले प्रदेश अध्यक्ष ने उनसे फोन पर बात की। कमिश्नर ने किसानों को कमिश्नरी आने से मना करते हुए कहा कि वह एसडीएम सदर को इटौआ भेज रहे हैं। किसान उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत करा दें।
इसके बाद सुबह 11 बजे सदर एसडीएम विशु राजा ने इटौआ पहुंचकर किसानों से बात की। किसानों ने कहा कि बीडीए अफसर अफवाह उड़ा रहे हैं कि सभी किसान जमीन देने को तैयार हो गए हैं जबकि एक भी किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहता। इस पर एसडीएम सदर ने एलान किया कि किसानों की मर्जी के बगैर उनकी एक भी इंच जमीन नहीं ली जाएगी। सिर्फ उन्हीं किसानों की जमीन ली जाएगी जो खुद जमीन बेचने के इच्छुक होंगे।
बता दें कि प्रशासन के दबाव बनाए जाने से किसानों में लगातार गुस्सा बढ़ने के बाद कुछ भाजपा विधायकों ने भी इस अधिग्रहण प्रक्रिया का विरोध शुरू कर दिया था। इससे पहले बीडीए के अफसरों कुछ जगह किसानों का अवैध कब्जा बताकर उन पर दबाव बनाने की कोशिश की थी।
बीडीए इन गांवों में चाहता है अधिग्रहण
बीडीए अपनी रामगंगा आवासीय परियोजना के विस्तार के लिए चंदपुर बिचपुरी, डोहरिया, अब्दुलापुर , कलारीलालपुर, इटौआ बेनीराम, मोहनपुर उर्फ रामनगर, अहरौला, बालीपुर अहमद, नहरिया, नवदिया झादा और कचौली गांव की जमीनों का अधिग्रहण करना चाहता है। हालांकि किसान अपनी जमीनें देने को तैयार नहीं हैं।