जिला अस्पताल रोड से जिला पंचायत कार्यालय की ओर जाने वाली 30 फुट चौड़ी सार्वजनिक सड़क पर अनधिकृत ढंग से इंदिरा मार्केट लगाए जाने को अदालत में चुनौती दी गई है। जागर जनकल्याण समिति के डॉ. प्रदीप कुमार ने सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में यह अतिक्रमण हटाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। उनका आरोप है कि नगर निगम बोर्ड ने कई साल पहले सार्वजनिक सड़क को 119 फड़ विक्रेताओं को गैरकानूनी ढंग से आवंटित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया था, जिसके बाद दुकानदारों ने यहां स्थाई और अस्थाई दुकानें बना लीं। डॉ. प्रदीप कुमार की शिकायत के बावजूद नगर निगम ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की तो उन्होंने सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया।
अमर उजाला ने छह सितंबर 2015 को समाचार प्रकाशित कर सड़क को 119 दुकानों के लिए गैर कानूनी तरीके से आवंटित कर देने का मामला उठाया था। नगर निगम के अफसरों द्वारा बसाया गया यह अतिक्रमण अब इंदिरा मार्केट के नाम से जाना जाता है। इसी समाचार को आधार मानकर जागर जनकल्याण समिति की ओर से सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा दायर किया गया है, जिसमें कहा गया है कि जिला अस्पताल रोड से जिला पंचायत रोड को मिलाने वाली 30 फुट चौड़ी सड़क पर रेडीमेड कपड़ों का अनधिकृत बाजार लगता है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि नगर निगम जनता से वसूले गए कर की धनराशि से सड़क बनाई है और उसके रखरखाव पर भी लाखों रुपये खर्च करता है। इस सार्वजनिक सड़क को व्यापार करने के लिए आवंटित करना गैर कानूनी है।
बाजार में फंस जाते हैं मरीज
जिस सड़क पर इंदिरा मार्केट लगवाया जा रहा है, वह जिला अस्पताल जाने के लिए भी महत्वपूर्ण है। अतिक्रमण के चलते गंभीर मरीजों को समय से अस्पताल पहुंचाने में दिक्कत होती है जिससे उसकी जान तक संकट में आ जाती है। इस गैरकानूनी मार्केट में बिजली विभाग ने भी दुकानदारों को कनेक्शन दे दिए हैं। लिहाजा याचिका में नगर निगम और बिजली विभाग को भी पार्टी बनाया गया है। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने इस मामले में कोतवाली पुलिस से मामले पर आख्या मांगी है।
अवैध मार्केट में किराए पर उठती हैं दुकानें
याचिका में कहा कि इंदिरा मार्केट में सरकारी सड़क पर दुकानें बनाकर वहां मार्केट बनाना ही एक मसला नहीं है। हकीकत यह भी है कि रेडीमेड कपड़े का व्यापार करने वाले अनधिकृत कब्जेदार इन दुकानों को अपनी संपत्ति की तरह किराए पर उठाते हैं या बेचते हैं। एक गैर कानूनी कब्जे की जमीन की बोली छह सो सात लाख रुपये की लगती है। यह गैर कानूनी काम कोतवाली और नगर निगम के चंद कदम दूर होने पर होता है।