अध्यक्ष पद के लिए पांच दावेदार हैं मैदान में, नाम वापस कराने की सांठगांठ में जुटे डॉक्टर
बरेली। आईएमए चुनाव के लिए नामांकन पेटी खुलने के बाद दावेदार जीत के लिए जोड़तोड़ करने में जुट गए हैं। वहीं, दिग्गज अपने करीबी को निर्विरोध अध्यक्ष बनाने के लिए सांठगांठ करने में लगे हैं। चर्चा है कि नामांकन कराने वाले पांच दावेदारों में से दो डॉक्टर नाम वापस लेने के लिए तैयार भी हो चुके हैं। बाकी बचे दावेदारों को भी मनाकर उन्हें पक्ष में लेने की कवायद जारी है।
पिछले दो सालों से आईएमए अध्यक्ष के कार्यकाल में कोरोना महामारी हावी रही। इसकी वजह से कोई बड़ा निर्णय नहीं लिया जा सका। अब तीसरी लहर हावी होने की चर्चा शुरू हो चुकी है। ऐसे में आगामी अध्यक्ष निर्वाचित करने के लिए दिग्गजों की मंशा निर्विरोध चुनाव कराने की बताई जा रही है। अध्यक्ष पद संभालने के लिए सभी दावेदारों ने चिकित्सकों से वर्चुअल रूप से संपर्क करना तो पहले ही शुरू कर दिया था। मगर नामांकन पेटी खुलने के बाद सभी खुलकर मैदान में आ गए हैं। इसके साथ ही जोड़तोड़ का दौर शुरू हो गया है। नामांकन के करीब 24 घंटे ही बीते हैं कि पांच में से एक दावेदार ने साफ तौर पर खुद का नामांकन वापस लेने की बात कही है।
दिग्गजाें का कहना है कि एक अन्य चिकित्सक भी अध्यक्ष पद की दावेदारी से नाम वापसी के लिए तैयार हो गए हैं लेकिन उन्होंने अभी तक अपना रुख साफ नहीं किया है। हालांकि नामांकन वापसी के लिए अभी पांच दिन शेष हैं और तीन प्रत्याशी खुले तौर पर अब भी मैदान में डटे हैं और सभी का समर्थन हासिल कर खुद को निर्विरोध निर्वाचित करने के लिए प्रयासरत हैं। उनकी मदद में उनके ‘गुरु’ भी लगे हैं, जो अपने दमखम के जरिये उनकी नैया पार लगाने के लिए पूरी ताकत लगाए हुए हैं।
सोशल मीडिया पर जोर शोर से प्रचार
कोरोना महामारी के चलते पिछली बार की तरह ही इस बार भी वर्चुअल तरीके से दावेदार प्रचार प्रसार में जुटे हैं। आईएमए के अलग-अलग धड़ों में चिकित्सक अपने समर्थकों के जरिए प्रचार करके समर्थन मांगने मेें जुटे हैं। कुछ दावेदार सीधे संपर्क भी कर रहे हैं। चर्चा है कि जल्दी ही दावत और लेट नाइट पार्टियों का दौर भी शुरू होगा।
तो सालों बाद हो जाएगी निर्विरोध सीट
पिछले कई सालों से आईएमए के अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध नहीं हुआ है। मगर इस बार कुछ कद्दावर चिकित्सकों के हस्तक्षेप से ऐसे समीकरण बनने की चर्चा है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो आने वाले चुनाव के लिए यह मिसाल बन जाएगा। हालांकि असली स्थिति नामांकन वापसी के बाद ही साफ होगी।