धौरहरा / लखीमपुर खीरी। तहसील क्षेत्र के रमियाबेहड़ ब्लॉक का दो हजार की आबादी वाला गांव बाछेपारा घाघरा के कटान की वजह से नक्शे से गायब हो चुका है। जहां आबादी थी, वहां अब नदी बह रही है। ग्रामीणों की जमीनें, घर और गृहस्थी का सब सामान नदी में समा चुका है। कटान के दंश से पीड़ित ग्रामीण मजबूरन लावारिस हालत में सड़कों के किनारे और प्राइमरी स्कूलों में रहने को मजबूर हैं। घाघरा के कहर से पूरा का पूरा गांव तबाह होने के बाद भी तहसील से लेकर जिला प्रशासन तक एक माह भी घटना की गंभीरता से मुंह मोड़े है।
बेघर ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ एक बार तिरपाल और पिपिया देने के बाद दोबारा कोई उनकी सुध लेने नहीं आया। उन्हें न तो जमीन कटने का मुआवजा मिला और न ही कोई सरकारी इमदाद ही मिली।
पीड़ित ग्रामीण बताते हैं कि आखिर क्या-क्या बचाते। सब कुछ तो बर्बाद हो गया। कटान पीड़ितों को तहसील प्रशासन जमीन तक नहीं दिला सका, जिससे वह दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। कोई सड़कों पर जिंदगी गुजार रहा है तो कोई प्राथमिक विद्यालय में। अब स्कूल खुलने के बाद ग्रामीण कहां जाएंगे, इसका जवाब न तो कटान पीड़ितों के पास हैं और न तहसील प्रशासन के पास। मजबूरन ग्रामीण भटपुरवा, मंगरौली, धारीदास पुरवा, मौलही, हरसिंहपुर के प्राथमिक विद्यालयों एवं सड़कों के किनारे जान हथेली पर रखकर रहने को मजबूर हैं। प्रशासन से कोई मदद न मिलने पर उनमें रोष व्याप्त है। पीड़ितों का कहना है कि तहसील प्रशासन की तरफ से 15 दिन पहले सिर्फ एक बार पिपिया और एक बार राशन की किट दी गई। उसके बाद कोई भी अधिकारी या लेखपाल उनका हाल तक पूछने नहीं पहुंचा। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें न तो जमीन और घर कटने का मुआवजा मिला है और न ही, कोई सरकारी इमदाद। मजबूरन वह मेहनत मजदूरी करके किसी तरह परिवार का खर्चा चला रहे हैं।
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तहसीलदार का दावा-धुंसाकलां में दी जमीन
धौरहरा। तहसीलदार संतोष शुक्ला का कहना है कि बाछेपारा के कटान पीड़ितों के रहने के लिए धुंसाकलां में जमीन उपलब्ध कराई गई है। लेकिन, कटान पीड़ित वहां जाना नहीं चाहते। उधर, कटान पीड़ितों का कहना है कि धुसांकलां के पड़ोस में नाला और श्मशान घाट है। नाले में मगरमच्छ रहते हैं, जिससे वह अपने आपको वहां असुरक्षित महसूस करते हैं। कटान पीड़ितों का कहना है कि अन्य कई जगह हैं। तहसील प्रशासन वहां पर उन्हें जमीन उपलब्ध कराए। संवाद
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पिछले साल के कटान पीड़ितों को अबतक नही मिला ठिकाना
धौरहरा। पिछले साल घाघरा नदी ने बाछेपारा के कुछ घरों को काट लिया था। कटान से बेघर हुए ग्रामीण बिंजहा के प्राथमिक विद्यालय में रह रहे हैं, जिन्हें अब तक तहसील प्रशासन रहने के लिए जमीन नही दिला सका है और न ही उन्हें कटी जमीन का मुआवजा दिलाया गया है। कटान पीड़ित ओमप्रकाश का पक्का घर और जमीन, अमरीका की 25 बीघा भूमि और घर, नंदराम की 82 बीघा फसल लगी भूमि, श्यामकली, जगदीश, बालकराम, कमलेश, राकेश, सुरेश, रामलाल अमित, अशोक कुमार का घर और जमीन नदी में समा गई थी। तबसे वे लोग स्कूल में ठहरे हुए हैं। प्रशासन से कोई भी मदद नही मिली है।
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सैकड़ों बीघा जमीन काट बाछेपारा गांव का मिटाया वजूद
धौरहरा। रमियाबेहड़ के बाछेपारा में घाघरा नदी ने बीते दो माह में पूरे गांव को काटकर लोगो को बेघर कर सड़क पर लाकर छोड़ दिया है। घाघरा नदी ने इस साल जगमोहन की पांच बीघा जमीन व पक्का घर, मनीराम की पांच बीघा खेत व घर, मेवालाल, रामकुमार, सीता देवी, रामेश्वर, गोबरे, राकेश, रामकुमार, परसादी, पैकरमा की दस बीघा जमीन व घर, गया प्रसाद, सतीश, रामलखन, श्रीराम, मनोहर की 15 बीघा जमीन व घर, बलराम की 10 बीघा जमीन व घर, काशीराम की 15 बीघा जमीन व घर, राजकुमार, अनुपम, बंशीलाल का 15 बीघा खेत व घर, महेश, अनारकली का 40 बीघा खेत व घर, मैकूलाल व प्रेमलाल का 10 बीघा खेत व घर, मथुरा का 10 बीघा खेत व घर, रमेश, कपिल, सुरेंद्र, भवानी दीन का 35 बीघा खेत व घर, शिवरतन का 35 बीघा खेत व घर, आबेद, सोहनलाल का 20 बीघा खेत व घर, सहित करीब 150 पचास परिवारों के खेत व घर नदी ने काट दिए। कटान पीड़ित झोपड़ी डालकर रहने को मजबूर हैं। वही भटपुरवा बिंजहा के अफजाल की 82 बीघा, मेराज की 5 बीघा, इदरीश की 20 बीघा भूमि नदी में समा चुकी है।
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पीड़ितों का दर्द उन्हीं की जुबानी
मनोहर लाल ने बताया कि उनका घर व खेती जो भी था, सब घाघरा नदी में समा गया। स्कूल में झोपड़ी डालकर गुजारा कर रहे हैं। सरकार की तरफ से कोई भी मदद नही मिली है और न ही रहने के लिए कोई व्यवस्था करायी गई।
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मथुरा प्रसाद का कहना है कि उनकी 10 बीघा खेती थी, जो पहले ही नदी में कट गई। अब घर भी कट गया है। परिवार सहित स्कूल में रह रहे हैं। तहसील से पिपिया व तिरपाल मिला है और एक बार राशन मिला है। उसके बाद कुछ नही मिला।
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अनारकली बताती हैं कि उनकी 40 बीघा खेती नदी में कट गई। अब परिवार के साथ स्कूल में रुक रही हैं। घर व खेती कटने के कोई भी मुआवजा नही मिला है और न ही रहने के लिए जमीन ही मिली है।
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सोहनलाल बताते हैं कि सड़क के किनारे छप्पर डालकर रहते हैं। 20 बीघा जमीन थी वह भी नदी ने कट गई, घर भी कट गया। सरकार ने रहने के लिए कोई व्यवस्था नही की है। मजदूरी कर परिवार चला रहे हैं।
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प्रभु ने बताया कि खेती व घर सब नदी में कट गया है। स्कूल में झोपड़ी डालकर रहते हैं। तहसील से राशन मिला था जो खत्म हो गया है। दोबारा कुछ नही मिला। लेखपाल सर्वेे करके चले जाते हैं।
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रामकुमार उर्फ बावर जो बोल तो नही पाते हैं लेकिन इशारे से सब बताते हैं कि घर व जमीन सब कट गया। छप्पर डालकर सड़क के किनारे रहते हैं। तहसील से सिर्फ राशन मिला है। उसके बाद अब तक किसी ने हाल तक नही लिया।
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नंदराम बताते है कि 50 बीघा जमीन व घर सब पिछले साल नदी में समा गया। तबसे आज तक सरकारी स्कूल में डेरा डाले हुए हैं। तहसील से कोई सहायता नही दी गई और न ही रहने के लिए जमीन ही उपलब्ध कराई गई है। स्कूल खुलने वाले हैं। यहां से खाली करके अब सड़क के किनारे कहीं और ठिकाना बनाएंगे। मेहनत मजदूरी करके परिवार चला रहे हैं।
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अशोक कुमार का कहना है कि पिछले साल घाघरा की तबाही में उनका सब कुछ बह गया। सरकारी स्कूल में रह रहे हैं। तहसील से रहने के लिए भूमि नही दिलाई गई है और न ही कोई मदद मिली है।
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श्यामकली बताती हैं कि सब परिवार के साथ हंसी खुशी से रह रहे थे। घाघरा नदी ने सब कुछ काट लिया। अब स्कूल में परिवार सहित रहती हूं। कोई भी सरकारी मदद नहीं मिली है।
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सुनीता का कहना है कच्चा घर बना था। थोड़ी जमीन थी, सब नदी में समा गई। बेघर होकर सड़क के किनारे छप्पर डालकर परिवार सहित रह रही हैं। तहसील से केवल तिरपाल, पिपिया व एक बार राशन मिला है।
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कटान रोकने के लिए बोरियो में ईंटा भरकर डाला जा रहा है पानी अधिक होने के कारण बचाव कार्य में दिक्कत हो रही है फिर भी बचाव कार्य लगातार किया जा रहा है।
-बीडी गौतम, सहायक अभियंता बाढ़ खंड, शारदानगर
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एक राशन किट 15 दिन के लिए होती है। अगली फिर दे दी जाएगी। पीड़ितों के लिए तहसील में ही आवास की व्यवस्था की जाएगी। अगर तहसील में भूमि नहीं होगी तो क्रय कर आवासीय व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी। कुछ लोगों को घर के कटान का मुआवजा दिया गया है।
-डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया, डीएम
कटान करती घाघरा नदी। संवाद- फोटो : LAKHIMPUR