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हरियाली का सफाया होने के बंद अब तपती हैं ठंडी सड़कें

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बरेली। विकास की डगर पर बरेली शहर हरियाली को साफ करता हुआ आगे बढ़ रहा है। कोई वक्त था जब शहर में नेनीताल, पीलीभीत, रामपुर और शाहजहांपुर की ओर जाने वाले रास्ते दोनों तरफ विशाल पेड़ों की हरियाली से इस कदर ढके हुए थे कि गुफाओं सरीखी दिखाई देने की वजह से इन सड़कों को ठंडी सड़क कहा जाता था लेकिन हरियाली विहीन होने के बाद अब ये सड़कें दिन भर धूप में तपती हैं।
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बरेली कॉलेज बॉटनी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक खरे के मुताबिक नैनीताल, पीलीभीत, रामपुर और शाहजहांपुर रोड पर दोनों तरफ कई किलोमीटर तक घने और विशाल पेड़ों की कतार थी। इन रास्तों पर गुजरते हुए यात्रियों को गर्मी का एहसास होने के बजाय रोमांचक और खुशनुमा अनुभव होता था लेकिन सड़कों को चौड़ा करने के लिए हजारों पेड़ों का सफाया कर दिया गया। सौ साल से ज्यादा पुराने पेड़ों पर भी आरी चलाने में कोई संकोच नहीं किया गया।
डॉ. खरे कहते हैं कि नियम है कि एक पेड़ काटे जाने पर उसकी जगह दस पेड़ लगाए जाने चाहिए पर इसका कभी पालन नहीं हुआ। जो पेड़ लगे, वे भी देखरेख न होने की वजह से जड़ नहीं पकड़ सके। अब शहर की ज्यादातर सड़कें छायाविहीन हो चुकी हैं। राह चलते लोगों को धूप का ताप झेलना मुश्किल पड़ता है। डॉ. खरे कहते हैं कि नए रोपे गए पौधे कभी पुराने पेड़ों क ा आकार ले पाएंगे, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती क्योंकि पौधे अनुकूल वातावरण में ही विकसित होते हैं। हरियाली के नाम पर डिवाइडरों पर जो झाड़ियां लगाई जा रही हैं, उनसे पर्यावरण को कोई फायदा नहीं होने वाला।
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कान्हा उपवन, ग्राम्य वन में ट्रांसलोकेशन के
बाद 30 फीसदी पौधों ने ही पकड़ीं जड़ें
दो साल में रामगंगा नगर सड़क चौड़ीकरण, अर्बन हाट, नकटिया रोड चौड़ीकरण, लाल फाटक ओवरब्रिज निर्माण, चौपुला फ्लाईओवर और कई दूसरे निर्माणों में आड़े आ रहे करीब छह सौ पेड़ों को ट्रांसलोकेट कर कान्हा उपवन और मंझा ग्राम्यवन में रोपा गया। वन विभाग के मुताबिक दोनों स्थानों पर रोपे गए पेड़ों में से बमुश्किल 30 फीसदी पेड़ों पर ही दोबारा कोपलें निकलीं। कहा जा रहा है कि 30 फीसदी और पेड़ों पर कोपलें निकल सकती हैं। यह दावा मान भी लिया जाए तो जाहिर है कि 40 फीसदी हरियाली नष्ट हो गई है।
आसपास ट्रांसलोकेट हों पेड़
तभी पनप सकते हैं दोबारा
डॉ. खरे के मुताबिक पौधे जहां रोपे जाते हैं, बढ़ने के लिए वे आसपास के वातावरण से तालमेल बनाते हैं। सालों तक वे उसी वातावरण में ही रहते हैं। विकसित पेड़ों के तनों को ट्रांसलोकेशन के लिए उनकी शाखाएं काटकर 20 किमी से अधिक दूर ले जाने की मुहिम से कागजों का ही पेट भर रहा है। कुछ ही पेड़ जड़ें पकड़ पा रहे हैं। जिला प्रशासन और वन विभाग को चाहिए कि ट्रांसलोकेट करने का स्थान एक किमी के दायरे में रखा जाए। ऐसे में उनके दोबारा पनपने की संभावना 80 फ ीसदी तक रहेगी।
पांच सालों में 20 लाख पौधों के सूखने की आशंका
पिछले करीब पांच सालों के पौधरोपण के रिकॉर्ड के मुताबिक जिले में हर साल मानसून के दौरान करीब 30 लाख पौधे रोपे गए हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इनमें दस फीसदी पैधे सूख जाते हैं। इसी लिहाज से अब तक करीब 20 लाख पौधे सूख चुके हैं। हर साल 24 विभाग पौधरोपण करते हैं। जिला प्रशासन वन एवं पर्यावरण समिति की बैठक में लगातार रोपे गए पौधों के स्थान, उनके वर्तमान स्थिति को लेकर जवाब मांगता है मगर कुछ ही विभाग रिकॉर्ड उपलब्ध कराते हैं। बाकी विभागों की चुप्पी खुद हकीकत बयां कर देती है।
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