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तेजी से बढ़ रही प्रदूषण की मार... पेड़-पौधों को भी कर रही बीमार

Wed, 08 Sep 2021 03:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा अजीत प्रताप सिंह, बरेली

सार

जहरीली आबोहवा में पेड़ों के पनपने की क्षमता और ऊर्जा शक्ति लगातार हो रही है कम। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में प्लांट साइंस के प्रोफेसर ने पेड़ों पर प्रदूषण के दुष्प्रभाव पर किया शोध
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demo pic... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नॉन अटेनमेंट (अति प्रदूषित) शहरों की सूची में शामिल बरेली की आबोहवा में अब पेड़-पौधों का दम भी घुटने लगा है। प्रदूषण की मार से पेड़-पौधे बीमार हो रहे हैं। उनके पनपने की क्षमता और ऊर्जा शक्ति का तेजी से ह्रास हो रहा है। एजिंग हार्मोन थायलिन एसिड के समय से पहले सक्रिय होने से पौधों की उम्र भी कम हो रही है। पौध के पेड़ बनने की संभावना भी करीब 30 फीसदी तक कम होने की आशंका है।

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हैरान करने वाले ये तथ्य रुहेलखंड विश्वविद्यालय में प्लांट साइंस के प्रोफेसर डॉ. आलोक श्रीवास्तव के शोध में सामने आए हैं। डॉ. आलोक ने बताया कि वह कई सालों से लगातार पुराने पेड़ों और विभिन्न प्रजाति की रोपी गई पौध पर प्रदूषण के दुष्प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। इसमें पता चला है कि प्रदूषण का पेड़-पौधों पर बहुत बुरा असर हो रहा है। उनकी जीवन सक्रियता प्रभावित हो रही है। लगातार प्रदूषित क्षेत्र में रहने से पौधों की पत्तियों पर जमे धूल के कणों की वजह से उन्हें ऊर्जा हासिल करने के लिए रेस्पिरेशन तेज करना पड़ता है, यानी खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें इस कदर जद्दोजहद करनी पड़ती है कि उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इसी में व्यर्थ खर्च हो जाता है। यह उनके जीवन पर भारी पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त जो हार्मोन कठिन समय में सक्रिय होते हैं, वे पहले ही सक्रिय हो जाते हैं। थायलीन एसिड का स्राव अधिक बढ़ने से पेड़-पौधों का जीवन चक्र बिगड़ जाता है। इससे कुछ पौधों पर फूल और पेड़ों पर फल जल्दी या फिर देरी से आ रहे हैं। दोनों ही परिस्थितियों में पौधों की औसत आयु प्रभावित होती है। ऊर्जा हासिल करने के लिए माइटोकॉन्ड्रिया तेजी से काम करता है, इससे पेड़-पौधे बीमार हो रहे हैं। 
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पत्तियां हो रहीं छोटी, बन रही हैं गांठें
अध्ययन के अनुसार पेड़-पौधों में भोजन बनाने की प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो रही है। इसकी वजह से उनकी सामान्य वृद्धि प्रभावित हो रही है। लिहाजा, पत्तियां भी छोटी होने लगी है। डॉ. आलोक के मुताबिक हवा में मौजूद रेस्पाइरेबल पार्टीकुलेट मैटर (पीएम-10) और (पीएम 2.5) जहां इंसानों के फेफड़ों को बीमार कर रहा है, वहीं पौधों का भी दम घोट रहा है। उन्हें बीमार बना रहा है। एसपीएम और आरपीएम बेहद घातक साबित हो रहे हैं।

भोजन नहीं बना पा रहे हैं पेड़-पौधे
हाईवे और ऐसी जगह जहां सड़कें टूटी हैं, ज्यादा जाम रहता है, वहां पौधे पत्तियों के जरिए सूर्य के प्रकाश से संश्लेषण नहीं कर पा रहे हैं। आरएसपीएम और एसपीएम केमिकल युक्त होते हैं। यह पत्तों के रंध्र बंद कर देते हैं। इसकी वजह से वातावरण की गैस और प्रकाश रुकने से वास्पोत्सर्जन बंद हो जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है। इसकी वजह से पेड़-पौधे अपने लिए भोजन नहीं बना पा रहे।

पेड़ हो रहे कमजोर, हल्की आंधी में ही गिर रहे
अध्ययन में डॉ. आलोक श्रीवास्तव ने पाया कि केवल हाईवे ही नहीं शहर में मौजूद पेड़-पौधों का जीवन भी महीन केमिकल युक्त धूल के कणों की भेंट चढ़ रहा है। वृद्धि दर में 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। भरपूर पोषण न मिलने के कारण पेड़-पौधे बेहद कमजोर हो रहे हैं। इसकी वजह से हल्की आंधी में भी बड़े दरख्त गिर जा रहे हैं। शोध में उन्होंने सड़कों के किनारे लगे पौधों पर पानी का छिड़काव करने का सुझाव दिया है।

पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होने की आशंका
डॉ. आलोक का कहना है कि पेड़ों के पनपने की क्षमता प्रभावित होने से भविष्य में पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन को रोकने के दो ही बड़े मंत्र हैं, कार्बन को सोखना और जैव-विविधता यानी बायोडायवर्सिटी। प्रदूषण से बढ़ रहा तापमान और प्राकृतिक आपदा पेड़ों का दम घोट रही है। तापमान, ह्यूमिडिटी, बारिश का चक्र बदल रहे हैं। इसे रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा पौधरोपण की जरूरत है।

करीब 35 फीसदी सूख रहे पौधे
माना जाता है कि पौधरोपण के बाद सकारात्मक पर्यावरण में भी विभिन्न वजहों से 10 फीसदी पौधे नहीं पनपते हैं, लेकिन अध्ययन में सामने आया है कि प्रदूषित इलाकों में करीब 35 फीसदी पौधे नहीं पनप पा रहे हैं। साथ ही, जो पौधे पेड़ बन चुके हैं उनमें कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता भी कम हो रही है, इसलिए बड़ी तादाद में पौधरोपण की जरूरत है ताकि जहरीली हवा के दुष्प्रभाव को रोका जा सके।

इन जगहों के पेड़-पौधों को शोध में किया शामिल
आईवीआरआई, बदायूं रोड, पीलीभीत बाईपास, शाहजहांपुर रोड, रामपुर गार्डन मुख्य मार्ग, चौपुला, सीबीगंज मार्ग, नैनीताल रोड, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, जिम कार्बेट, बरेली से निकलने वाले हाईवे और ग्रामीण इलाके। घनी आबादी, हाईवे, निर्माण कार्य वाले स्थानों के पेड़ों पर प्रदूषण का ज्यादा दुष्प्रभाव दिखा, पहाड़ और ग्रामीण इलाकों में पेड़-पौधे फिलहाल सुरक्षित हैं।

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