हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद नहीं चाहते थे कि उनके बेटे हॉकी खेलें। वह अपने बेटों को पढ़ा-लिखाकर सरकारी नौकरी में भेजना चाहते थे। ऐसा नहीं कि हॉकी के प्रति उनकी दीवानगी कम हो गई थी बल्कि घर की खराब आर्थिक स्थिति को देखकर वह अपने बेटों को हॉकी से दूर रखना चाहते थे, क्योंकि उस वक्त हॉकी में उतना पैसा नहीं था। रविवार को बरेली में आयोजित एक समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करने आए मेजर ध्यानचंद के बेटे पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी अशोक ध्यानचंद ने अपने पिता से जुड़े अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि पापा (मेजर ध्यानचंद) कभी भी घर में हॉकी की बात नहीं करते थे। जब मीडिया के लोग मिलने आते थे तभी हॉकी की बात होती थी। उन्होंने बड़े भावुक अंदाज में बताया कि दुनिया के लिए उनके पिता हॉकी के जादूगर थे, लेकिन घर की स्थिति देखकर वह खुद को बहुत कमजोर आंकते थे। यही वजह थी कि वह अपने बेटों को हॉकी से दूर रखना चाहते थे। हालांकि उनके सभी बेटों ने पिता की दीवानगी को ही अपनाया। एक को छोड़कर बाकी छह भाइयों ने हॉकी खेली।
वर्ष 1972 और 1976 में ओलंपिक खेलने वाले अशोक ध्यानचंद कहते हैं कि 1970-80 के बीच तक वह अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी रहे। 1975 में पाकिस्तान को हराकर भारत ने गोल्ड जीता था। अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने से पहले उन्होंने पिता को बताया ही नहीं था कि वह हॉकी खेलते हैं। जब भारतीय टीम में शामिल हुए तब उनको इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनके सबसे बड़े भाई बृजमोहन सिंह हॉकी के नेशनल प्लेयर रहे। उनसे छोटे सोहन सिंह एथलीट रहे। इनके अलावा भाई राजकुमार सिंह, उमेश कुमार सिंह, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह हॉकी प्लेयर रहे। अशोक ध्यानचंद कहते हैं कि आज हॉकी में बहुत पैसा है, लेकिन उस वक्त सिर्फ देश के लिए खेलने का जुनून था, पैसा इतना नहीं मिलता था।
तिरंगा न देखकर छलक आए थे आंसू
अशोक ध्यानचंद ने पिता मेजर ध्यानचंद से जुड़ी यादें साझा करते हुए बताया कि जर्मनी में 1936 में भारतीय टीम फाइनल जीती। सब जश्न मना रहे थे, लेकिन वहां पर मेजर ध्यानचंद नहीं थे। जब उन्हें खोजा गया तो वह मैदान के पास उस जगह मिले, जहां सभी देशों के झंडे लहरा रहे थे। वहां भारतीय झंडा न देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। ऐसे इंसान को भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया, यह सोचने की बात है। उन्होंने कहा कि उनके पिता को भारत रत्न मिलना चाहिए।
हॉकी का शरीर बचा आत्मा खत्म हो चुकी
वर्तमान हॉकी के हालातों पर जब उनसे बात की तो उनका कहना था कि आज हॉकी का सिर्फ शरीर बचा है, आत्मा खत्म हो चुकी है। वह एक बार बरेली में भी खेलने आए थे। उस वक्त यहां कई अच्छे खिलाड़ी थी। बरेली में एक प्रदर्शनी मैच भी खेला था। कार्यक्रम के बाद वह स्टेडियम भी पहुंचे। हॉकी खिलाड़ियों से अपने अनुभव साझा किए। उनको एक दो शॉट लगाकर भी दिखाए।