संवाद न्यूज एजेंसी
पुवायां (शाहजहांपुर)। एक गरीब की बेटी कोरोना संक्त्रस्मण से जान गंवाने वाली अपनी मां की लाश लेकर पांच दिनों तक मेडिकल कॉलेज में इंतजार करती रही कि कोई दाह संस्कार करा दे।
उसके लाचारी की आहट एक मुस्लिम युवक और कुछ एंबुलेंस चालकों तक पहुंची। उन सबने मिलकर दाह संस्कार का इंतजाम किया। इसके बाद बिटिया ने मां को मुखाग्नि दी।
पुवायां के शास्त्रीनगर निवासी भगवान दास मेहनत मजदूरी कर अपना परिवार चलाते थे। महामारी के दौर में उनकी मजदूरी बंद हो गई। रोटी के भी लाले पड़ गए। 23 अप्रैल को उनकी पत्नी सुदामा बीमार हो गईं। बिटिया मंजू मां को लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंची।
वह कोविड पॉजिटिव निकलीं। कई दिन इलाज के बाद सुदामा ने दम तोड़ दिया। अस्पताल वालों ने मंजू को लाश सौंप दी और कहा कि इसका अंतिम संस्कार कर दो।
मंजू ने बताया कि वह रो भी न पाई कि उसे इस बात चिंता सताने लगी कि मां का दाह संस्कार कैसे होगा। उसके पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है। मेडिकल कॉॅलेज के अफसरों के पास गई। मां की अंत्येष्टि कराने की गुजारिश की। पर किसी ने न सुनी।
हताश, निराश और लाचार लड़की मेडिकल कॉलेज परिसर स्थित मोचज़्री में रखी अपनी मां के लाश के पास जाकर बैठ गई। इंतजार करती रही कि कोई उसकी सुन ले। एक ओर उसे मां के जाने का दुख। दूसरी ओर उसका भूखा पेट भी उसे सताने लगा। कहीं से कुछ मिलता तो खा पी लेती।
पांच दिन बाद एक मुस्लिम युवक मेराजुद्दीन खान को उसकी मजबूरी पता लगी। उसने एंबुलेंस चालक मुदीद और वीरू तक यह बात पहुंचाई। इसके बाद एंबुलेंस चालकों ने आपस में चंदा करके कुछ रुपये जमा किए और मुफलिस महिला के शव का गराज़् घाट पर अंतिम संस्कार कराया।
बेटी मंजू ने उसे मुखाग्नि दी। इस तरह एंबुलेंस चालकों ने इस क्रूर वक्त में मानवीय संवेदना की नजीर पेश की और उस सिस्टम की कलई खोली, जो यह कहता है कि हम कोरोना से मरने वालों की अंत्येष्टि भी कराएंगे।