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लोकसभा चुनाव: यहां डेढ़ दशक पहले हारी, फिर जीत के ट्रैक पर नहीं आई कांग्रेस; बसपा नहीं बना पाई जगह

Fri, 05 Apr 2024 01:09 PM IST
मुकेश कुमार शशांक मिश्र, बरेली ब्यूरो

सार

लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने अपनी जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना शुरू कर दिया है। बरेली मंडल की पांच और लखीमपुर की दो सीटों की बात करें तो वर्तमान में ये सातों सीटें भाजपा के खाते में हैं। इन सीटों पर कांग्रेस का विजयरथ डेढ़ दशक से थमा है।
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लोकसभा चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जंगल व पहाड़ों से घिरे बरेली मंडल और लखीमपुर खीरी की सात लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का विजयरथ डेढ़ दशक से थमा है। अंतिम बार कांग्रेस ने बरेली और धौरहरा सीट पर वर्ष 2009 के चुनाव में विजयश्री हासिल की थी। सपा का भी बदायूं सीट पर 2014 तक कब्जा बरकरार रहा था और इसके बाद पिछले दो चुनावों से इस पूरे इलाके में सूपड़ा साफ है। वहीं, बसपा इन सातों सीट पर अब तक अपनी जगह नहीं बना पाई है और ज्यादातर लोकसभा सीटों पर वह तीसरे नंबर की पार्टी बनी ही रही है। 

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इधर, लोकसभा चुनाव की दुंदुभि बजने के साथ ही एक बार फिर राजनीतिक दलों ने अपनी जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना शुरू कर दिया है। सभी पार्टियों के उम्मीदवार अपनी जीत के साथ ही नया इतिहास रचने की तैयारी में हैं। वैसे आजादी के बाद कांग्रेस के आधिपत्य वाली इन सभी सातों सीटों को फतह करने में भाजपा को भी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। हालांंकि, सबसे पहले जनसंघ ने बरेली लोकसभा सीट को अपने कब्जे में किया था और लगातार नौ वर्ष तक विपक्ष को इस सीट से दूर रखा। इसके बाद अलग-अलग सीटों पर कांग्रेस और फिर सपा ने अपना कब्जा जमाया। जनता दल ने भी इन सीटों पर जीत दर्ज कर अपना वर्चस्व यहां कायम किया था।

संतोष गंगवार ने दिलाई बरेली में भाजपा को पहली जीत
बरेली लोकसभा सीट पर आजादी के बाद कांग्रेस के सतीश चंद्र पहले सांसद बने और अपने दो कार्यकाल पूरे किए। इसके बाद जनसंघ के बृजराज सिंह और बृजभूषण लाल ने यहां का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1971 में कांग्रेस ने यहां वापसी की, लेकिन इमरजेंसी के बाद बदले हालात में जनता पार्टी के राममूर्ति वर्ष 1977 और मिसरयार खां वर्ष 1980 में सांसद बने। वर्ष 1981 और 1984 में कांग्रेस की बेगम आबिदा अहमद दिल्ली पहुंची थीं। इसके बाद भाजपा ने इस सीट को अपने नाम किया और संतोष गंगवार वर्ष 1989 से लगातार छह बार सांसद बने। यहां अंतिम बार वर्ष 2009 में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद फिर यहां भाजपा का ही कब्जा है।

आंवला में 40 से कांग्रेस को जीत का इंतजार
आंवला लोकसभा सीट पर कांग्रेस को 40 साल से जीत का इंतजार है। यहां वर्ष 1984 में कांग्रेस के कल्याण सिंह सोलंकी ने जीत दर्ज की थी। इस सीट पर आजादी के बाद पहली जीत हिंदू महासभा के बृजराज सिंह ने दर्ज की और इसके बाद वर्ष 1967 में कांग्रेस की सावित्री श्याम सांसद बनीं। वर्ष 1977 में जनता पार्टी, 1980 में जनता पार्टी सेक्युलर ने यहां प्रतिनिधित्व किया। सपा ने यहां से दो बार जीत दर्ज की और वर्ष 1996 व 1999 में सर्वराज सिंह के सिर पर जीत का सेहरा बंधा। वर्ष 1989 में पहली बार भाजपा ने खाता खोला और 2009 में मेनका गांधी की जीत के बाद से भाजपा का विजयरथ जारी रहा।

पीलीभीत में समाजवादी पार्टी को मयस्सर नहीं हुई जीत
पीलीभीत सीट पर अब तक सपा को जीत मयस्सर नहीं हुई। इस सीट पर कांग्रेस भी महज दो बार चुनाव जीतने में सफल रही है। इसके अलावा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के मोहन स्वरूप वर्ष 1957 से लगातार तीन बार सांसद बने। इसके बाद मेनका गांधी लगातार चार बार यहां से सांसद बनीं। हालांकि पहले उन्होंने जनता दल प्रत्याशी और फिर दो बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की। वर्ष 2004 में भाजपा के सिंबल पर जीत दर्ज करने के बाद इस सीट से बेटे को वरुण को संसद भेजा। वर्ष 2014 में उन्होंने पांचवीं बार जीत दर्ज। हालांकि इस बार भाजपा ने उनके बेटे वरुण गांधी का टिकट यहां से काट दिया है।

बदायूं में लंबे समय तक रहा पंजे और साइकिल का ही कब्जा
बदायूं लोकसभा सीट पर कांग्रेस और सपा ने ज्यादातर समय तक कब्जा जमाया। हालांकि वर्ष 1962 में जनसंघ के ओंकार सिंह ने अपने दो कार्यकाल पूरे किए। इस सीट से पांच बार कांग्रेस और छह बार सपा ने जीत दर्ज की। सलीम इकबाल शेरवानी यहां से पांच बार सांसद रहे। पहले वे कांग्रेस और फिर सपा के चुनाव चिह्न पर जीते। इसके बाद वर्ष 2009 सपा के धर्मेंद्र यादव ने भी दो बार चुनाव जीता। यहां भाजपा ने वर्ष 2019 में जीत दर्ज की।

शाहजहांपुर में छह बार कांग्रेस और पांच बार भाजपा को मिली जीत
शाहजहांपुर सीट पर सबसे ज्यादा छह बार कांग्रेस को जीत मिली है। पिछले एक दशक से भाजपा के कब्जे वाली इस सीट पर वर्ष 1989, 1991 और 1998 में पार्टी के सत्यपाल यादव सांसद बने। पीलीभीत से भाजपा प्रत्याशी जितिन प्रसाद के पिता यहां से चार बार सांसद रहे और जितिन प्रसाद भी वर्ष 2004 में यहां जीते थे, यही इस सीट पर कांग्रेस की अंतिम जीत थी।
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लखीमपुर खीरी में पहली रामलहर में कमल ने दर्ज की थी जीत
1990 के दशक में पहली राम लहर में लखीमपुर खीरी में 1991 और 1996 के दो चुनावों में भाजपा अपराजेय रही। इसके बाद वर्ष 1998 से 2004 तक तीन चुनावों में सपा ने यहां परचम लहराया। एक दशक से फिर से भाजपा के अजय मिश्र टेनी यहां से जीत दर्ज कर रहे हैं। यहां पहला चुनाव प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने जीता था और फिर 15 वर्ष तक यह सीट कांग्रेस के पास रही। वर्ष 2009 में जफर अली नकवी के जरिये कांग्रेस अपनी अंतिम जीत यहां दर्ज करा पाई थी। 

धौरहरा में एक बार कांग्रेस और दो बार जीती भाजपा
वर्ष 2009 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई धौरहरा सीट पर पहली बार कांग्रेस के जितिन प्रसाद जीते थे। इसके बाद पिछले दो चुनाव में भाजपा को यहां जीत मिली है।
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