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‘बाबा-ए-रुहेलखंड’ डॉ. रस्तोगी और उनके साथी

Sun, 10 Aug 2014 05:30 AM IST
Bareilly
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बरेली। डॉ. ताराचरन रस्तोगी, जिन्हें कभी बाबा-ए-रुहेलखंड कहा गया था, अब बरेली वालों को याद नहीं हैं। वह हिंदी, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के बड़े विद्वान थे और उन्होंने कई महत्वपूर्ण किताबों की रचना की थी। बरेली के मलूकपुर मोहल्ले के एक जमींदार खानदान में उनका जन्म हुआ था। बाद में उन्होंने अंग्रेजी, समाजशास्त्र, इतिहास और फारसी में स्नातकोत्तर की डिग्रियां प्राप्त करने के साथ ही अंग्रेजी में डॉक्टरी की उपाधि भी ली। वह कई कॉलेजों में प्रोफेसर और बाद में पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में प्राचार्य भी रहे। नौकरी के दौरान ही 14 अगस्त 1982 को असम में हुए भूस्खलन में उनका परिवार दब गया, जिनमें उनकी डॉक्टर पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा था। इस दुर्घटना ने उन्हें तोड़कर रख दिया।
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बात 1942 की है के उन दिनों की है जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन की गहमा-गहमी थी। उन्हीं दिनों मलूकपूर के पास कौआ टोला में सीताराम मंदिर में एक विशाल जनसभा आयोजित की गई थी जिसमें मौलाना मोहम्मद अली, शौकत अली और उनकी मां ने जोरदार तकरीर की। इसी मंदिर में मौलाना अताउल्लाह शाह बुखारी और मौलाना हुसैन अहमद मदनी के भी भाषण हुए। अगस्त क्रांति का उफान तब चरम पर था। बरेली में स्टूडेंट फेडरेशन ने कचहरी स्थित मुहाफिजखाना को आग लगाने की योजना बना डाली। वहां पहुंचकर उन्होंने गोरखा सिपाही को सिगरेट देकर बातों में लगा लिया। इकराम ने पेट्रोल से भरा कनस्तर ताराचरन रस्तोगी के हाथ से लेकर उन्हें अपने कंधे पर चढ़ा लिया और रोशनदान के जरिए पेट्रोल से भीगा रस्सा अंदर डालकर उसमें आग लगा दी। देखते ही देखते मुहाफिजखाना धू-धूकर जलने लगा। पूरे चार दिनों में इस आग पर काबू किया जा सका। इस पूरी कार्रवाई में कलेक्ट्रेट बरेली के एक कर्मचारी पीडी जोशी का भी योगदान रहा, जिन्हें 11 अगस्त को गुप्तचर विभाग ने पकड़ लिया और उन्हें सजा हुई। कौन जाने आज उनका परिवार कहां है।
मुहाफिजखाने की आगजनी के 11वें दिन एक और बड़ी घटना को इन लोगों ने अंजाम दिया। आज की स्टेट बैंक और कचहरी के बीच से जो रास्ता कैंट की ओर जाता है, उधर से तीनों दोस्त अपने कुछ साथियों को बुलाने कैंट के सदर बाजार जा रहे थे। तभी सुनसान रास्ते पर एक हिंदुस्तानी और दो अंग्रेज फौजी अफसर हंसते हुए बातें करते निकल रहे थे। ऐसा कुछ तय नहीं था, लेकिन अचानक इकराम ने अपना पिस्तौल निकालकर अंग्रेज फौजी अफसरों को निशाना बना दिया। उन्होंने हिंदुस्तानी अफसर पर गोली नहीं चलाई और किसी तरह छिपते हुए निकल भागने में कामयाब हो गए। इसके कुछ दिनों बाद ही उन्होंने एक रेल के गुजरने से पहले पटरियां भी उखाड़ीं। (सुधीर विद्यार्थी की किताब ‘बरेली: एक कोलाज’ से साभार)।
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सन बयालिस का आंदोलन स्वत: स्फूर्त था। क्रांतिकारी चेतना जैसे पूरे संघर्ष में उतरती चली गई। बरेली में बयालिस का उफान देश के उस क्रांतिकारी संघर्ष के समानांतर ही चल रहा था, जिसने अपनी कारगुजारी से अगस्त की इस क्रांति को अनोखे आयाम प्रदान किए और देश स्वतंत्रता संग्राम के एक नए दौर में प्रवेश कर सका।
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- सुधीर विद्यार्थी
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