बरेली। कम कीमत पर काम का एस्टीमेट तैयार कर उसे रिवाइज करने का खेल लोक निर्माण विभाग में धड़ल्ले से चल रहा है। अधिकतर ठेकों का एस्टीमेट रिवाइज किया गया है लेकिन विभाग के आवासों की मरम्मत के नाम पर जो हुआ, वह लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली का खुलासा कर रहा है। विभाग के अधिकारियों के आवासों की मरम्मत के नाम पर 3.58 लाख रुपये का एस्टीमेट स्वीकृत कराया और ठेकेदार से 32 लाख रुपये से अधिक खर्च करा लिए। इस खर्च का 12 लाख रुपये का भुगतान भी करा दिया गया। बीस लाख रुपये का भुगतान न होने पर ठेकेदार को एक साल पहले हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। हाईकोर्ट ने एक महीने में मामला निस्तारित करने का आदेश दिया लेकिन ठेकेदार को अभी तक भुगतान नहीं मिला।
14 जुलाई 2011 को पीडब्ल्यूडी में चीफ इंजीनियर, अधीक्षण अभियंता, अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता और अवर अभियंताओं के आवासीय भवनों की मरम्मत के लिए 3 लाख 58 हजार 567 रुपये का एस्टीमेट बनाया गया। मरम्मत का काम मैसर्स अग्रवाल कंस्ट्रक्शन को मिला। यह काम 13 जनवरी 2012 तक पूरा करने की शर्त थी। ठेकेदार ने आवासीय भवनों में काम करा दिया। इसके बाद 5 मई 2012 को लोक निर्माण विभाग प्रांतीय खंड के सहायक अभियंता ने ठेकेदार को प्रत्येक आवास में कराए जाने वाले 14 नए कामों का आदेश जारी कर दिया। इसके लिए आदेश पत्र तो दिया गया लेकिन एस्टीमेट नहीं बताया गया।
एई द्वारा बताए गए मरम्मत कार्यों पर लगभग 32 लाख रुपये खर्च हुए। ठेकेदार के मुताबिक किसी भी मद में आवासीय भवनों पर इतनी बड़ी रकम खर्च करने का प्रावधान नहीं था, लिहाजा उसका भुगतान लटक गया। हालांकि अफसरों ने दाएं-बांए से इंतजाम कराकर भुगतान कराने के आदेश एक्सईएन को दिए। जेई और एई ने इधर-उधर से इंतजाम कर 12 लाख का भुगतान तो कर दिया लेकिन 20 लाख अब भी नहीं मिले हैं। इस पर कंस्ट्रक्शन फर्म ने भुगतान के लिए हाईकोर्ट में रिट दाखिल की। हाईकोर्ट ने एक महीने में मामले के निस्तारण का आदेश दिया लेकिन अभी तक मामला लटका हुआ है। यह महज बानगी भर है। मामला बता रहा है कि लोक निर्माण विभाग के कामों में रिवाइज एस्टीमेट के जरिये कैसे खेल किया जा रहा है। ठेकेदारों के अनिश्चित कालीन धरने की लड़ाई का एक मुद्दा अवैध तरीके से कराए गए कामों का भुगतान होना भी हैं।
सवाल तो होंगे ही...
किस मद के तहत 32 लाख के कार्य कराए गए
विभागीय नियमावली में इसका क्या प्रावधान है
3.58 लाख का एस्टीमेट 32 लाख में कैसे बदला
एस्टीमेट और वर्क आर्डर के विरुद्ध किस मद में भुगतान हुआ
12 लाख रुपये का भुगतान किस मद में कराया गया
20 लाख का भुगतान किस मद में कराया जाएगा
अगर काम नियमानुसार हुए तो दो साल तक मामला दबाया क्यों