बरेली। गंगा जमुनी तहजीब देखनी हो तो रामगंगा नदी के किनारे चल रहे चौबारी मेले में आइए। यहां आपको सब रंग दिखाई देंगे। अपना गांव छोड़कर कुछ दिनों के लिए छोटी बस्ती बसाने वाले यहां के व्यापारी धार्मिक सद्भाव और सामाजिक समरता की मिसाल पेश कर रहे हैं। मेला परिसर में एक ओर नमाज हो रही है तो दूसरी तरफ पूजा भी। लोग एक दूसरे के घरों का ख्याल रखते हैं।
छोटी- छोटी बातों पर झगड़ने वाले अराजक शहरी लोग गंवई कहे जाने वाले इन लोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। चार दिन के मेले में आकर यहां लोग ऐसे घुल-मिल गए हैं जैसे बरसों से एक दूसरे को जानते हों। फतेहगंज पश्चिमी से पशु बेचने आए रईस अहमद और शोभाराम का परिवार अगल- बगल तंबू डालकर रह रहे हैं। रईस के अनुसार जब वह नखासा की ओर जाते हैं तो उनके बच्चों की देखरेख शोभाराम का परिवार करता है। चनेहटी से आए जमीलुद्दीन का तंबू सेट नहीं हो पाया है। उनके साथ उनके दो छोटे बेटे और एक बेटी के साथ पत्नी भी आई है। इनके बच्चाें को नवाबगंज के कुलदीप सिंह ने रात को अपने तंबू में सुलाया। मेले से शायद ही कोई पशु व्यापारी खाली हाथ जाता हो। क्यारा से आए प्रदीप बताते हैं कि दो जोड़ी बैल लाए हैं। एक खरीददार आकर एक हजार रुपये बयाना दे गए हैं। बैल कीमत 75 हजार रुपये हैं। प्रदीप बताते हैं कि यहां आकर जानवरों की अच्छी कीमत मिल जाती है। यहां बैल खरीदने नीलाखेड़ी से आए इरफान बताते हैं कि इस मेले का हर साल इंतजार रहता है।