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इबादत के साथ बनाई जा रहीं राखियां

Sun, 14 Aug 2016 11:32 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
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रक्षाबंधन के लिए राखी बनाता मुस्लिम मुकीम का परिवार। - फोटो : अमर उजाला
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बांदा। रोजाना पांचों वक्त की नमाज के लिए उठने वाले हाथ इन दिनों अपने हिंदू भाइयों के हाथों के लिए राखी तैयार करने में मशगूल हैं। रक्षाबंधन यूं तो भाई-बहन का त्योहार है लेकिन नवाब और ऋषि बामदेव की नगरी में यह सांप्रदायिक सौहार्द का भी पर्व है। इसकी बानगी रक्षाबंधन के कई दिनों पूर्व ही नजर आने लगी है। शहर का खुटला मोहल्ला सांप्रदायिक सौहार्द की नजीर बना है। मुस्लिम घरानों में तैयार की जा रहीं राखियां बांदा जिले के अलावा सीमावर्ती मध्य प्रदेश के कई जिलों तक जाएंगी। सावन के साथ ही रक्षाबंधन का बेसब्री से इंतजार होने लगा था। तैयारियां भी जोरशोर से चल रही हैं।
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उधर, खुटला मोहल्ले में कई मुस्लिम घरों में राखी बनाने का काम रात-दिन चल रहा है। इस्लाम मजहब के अनुयायी नमाज, रोजा, तिलावत के साथ रक्षाबंधन में अपने हिंदू भाई-बहनों के लिए राखियां बनाने से भी परहेज नहीं करते बल्कि वह इसे हुनर मानते हैं। दुनिया छोड़ चुके इस मोहल्ले के रसूल बख्श राखी के बढ़िया कारीगर थे। अब उनकी यह विरासत बेटे लाला सौदागर ने संभाल ली है। वह बताते हैं कि सावन भर पूरा परिवार राखी बनाने में जुट जाता है। इस बीच नमाज का वक्त आता है तो पाबंदी से नमाज अदा करते हैं। इसी तरह मोहम्मद मुकीम अपने परिवार के साथ राखी बनाने में जुटे हैं। उनकी बेटी महक, फिजा और निशा इसमें बराबर हाथ बटा रही हैं। खुटला में नासिर, मुस्तफा, शरीफ, गुड्डो, रमजान समेत लगभग एक दर्जन मुस्लिम परिवारों के घरों में राखियां बनाई जा रही हैं। मुस्लिमों के हाथ बनीं राखी बुंदेलखंड के झांसी, ललितपुर, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट सहित मध्य प्रदेश के पड़ोसी जनपद पन्ना व  छतरपुर में लोकप्रिय हैं।

चाइनीज राखियों की डिमांड ज्यादा
बांदा। चाइनीज व नए जमाने की हाईटेक राखियां देशी राखियों की लोकप्रियता में रोड़ा बन गई हैं। अब हालत यह है कि इसमें लागत ज्यादा और मुनाफा कम जैसी स्थिति हो गई है। दो दशक से राखी बना रही गुड्डो और लाला सौदागर बताते हैं कि यह पेशा उनके अंग लग चुका है इसलिए छोड़ा नहीं जा रहा है। राखी का एक पत्ता 36 रुपये में बिक रहा है। जबकि इसकी लागत 30 रुपये आ रही है। पहले अच्छा मुनाफा निकलता था। अब चाइनीज और अत्याधुनिक राखियों के आगे इन देशी राखियों की बाजार में वैल्यू भी कम हो गई है।
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