झंडू पुरवा में जर्जर कुएं के अंदरूनी हिस्से की मरम्मत के लिए उतरा ग्रामीण।
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जल संरक्षण के चौतरफा पीटे जा रहे सरकारी ढिंढोरे के बीच उपेक्षित पड़े जर्जर कुएं की कायाकल्प ग्रामीणों द्वारा चंदे और श्रमदान से की जा रही है। यह कुआं अनुसूचित जाति के 90 परिवारों की प्यास बुझाता है। 40 परिवार इसी के पानी पर निर्भर हैं। एकदम जर्जर हो चुके कुएं के कभी भी ध्वस्त होने का खतरा था।
अपनी समस्या का खुद निदान की यह सोच नरैनी ब्लाक के अतर्रा ग्रामीण ग्राम पंचायत अंतर्गत झंडू पुरवा के ग्रामीणों की है। इसमें खास भूमिका उन युवाओं की है जो रोजीरोटी की तलाश में गांव से पलायन कर गए थे, लेकिन महानगरों में भी रोजगार न मिलने से भटक कर युवक फिर गांव लौट आए हैं। अब उन्होंने गांव के इकलौते और सैकड़ों साल पुराने कुएं की तरफ रुझान किया है। लगभग पूरे गांव और खासकर 40 परिवारों को पूरे साल पीने का पानी मयस्सर कराने वाला कुआं धराशायी होने की कगार पर पहुंच गया था। ग्रामीणों को इस बात की भी चिंता थी कि कुआं धराशायी हुआ तो गांव में ब्याह कर आने वाली नई दुल्हन कुआं पुजाई कहां करेगी? गांव में किसी बच्चे के जन्म पर भी कुआं पूजने की परंपरा है।
ग्रामीणों ने एक राय होकर अपनी गाढ़ी और मजदूरी की कमाई से चंदा जुटाकर कुएं की मरम्मत शुरू करा दी है। श्रमदान का यह महान कार्य बुधवार से शुरू हो गया। 4000 रुपये की बालू और 3000 हजार रुपये की 10 बोरी सीमेंट खरीदी गई है। ईंट भी ग्रामीणों ने खुद इकट्ठा की हैं। श्रमदान के लिए प्रेरणा इस क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता राजाभइया ने दी। कुएं की मरम्मत में पहले दिन सुरेश कुमार, जगजीवन राम, भाईराम, ओम प्रकाश, मुन्नालाल, सुनैना, राजेश, बल्देव, जयकरन और धनराज आदि शामिल हुए। प्रति दिन बारी-बारी से 15-15 ग्रामीण श्रमदान करेंगे। कुएं की मरम्मत उसके अंदरूनी भाग से शुरू की गई है।
1500 आबादी, विकास कार्य धेला भर नहीं
झंडू पुरवा की आबादी लगभग 1500 है। अनुसूचित जाति से आबाद इस गांव के इर्द-गिर्द तीन हैंडपंप हैं। कुआं मात्र एक है। कुएं में गर्मी के दिनों भी पानी नहीं सूखता। कुएं के आसपास आबाद लगभग 40 परिवार पूरे साल इसी कुएं से पानी की जरूरत पूरी करते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता राजाभइया का कहना है कि इस गांव में विकास दूर-दूर तक नजर नहीं आता। अधिकांश ग्रामीण हर साल पलायन कर जाते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ग्रामीणों को 10 किलोमीटर दूर अतर्रा जाना पड़ता है।