केन नदी में बालू खनन। (फाइल फोटो)।
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बांदा। नदी और पहाड़ों को खोखला कर की गई करोड़ों की कमाई अबकी फिर विधानसभा चुनाव में लगेगी। खनिज संपदा से अपना खजाना भरने वाले नेता टिकट लेकर चुनावी प्रचार तक इसी कमाई से चुनाव परवान चढ़ाएंगे। लगभग सभी प्रमुख दलों के प्रत्याशियों के तार अप्रत्यक्ष रूप से बालू और पहाड़ों की खदानों से जुड़े हैं। टिकट हासिल करने के लिए करोड़ों रुपये का नजराना खनिज से ही खर्च हो रहा है। चित्रकूटधाम मंडल की 11 में से ज्यादातर सीटों पर यही नजारा है।
चुनावों में बालू कारोबारियों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दखल पिछले कई चुनावों से चला आ रहा है। खदानों से आई काली-सफेद रकम लुटाकर कई ने चुनावी नैया पार भी कर ली। कानूनी अड़चनों के चलते खदानों में सीधी भागीदारी न कर अपने भरोसेमंदों के साथ यह कारोबार लगातार चल रहा है।
मौजूदा विधानसभा चुनाव में भी यही हाल है। कई प्रमुख दलों में टिकट की दावेदारी कर रहे राजनीतिक बालू और पहाड़ कारोबार से जुड़े हुए हैं। इनमें से कई को टिकट मिलना भी तय माना जा रहा है। ऐसे में चुनाव खर्चीला होना भी तय है। निर्वाचन आयोग ने 40 लाख रुपये खर्च की अधिकतम सीमा तय कर दी है। लेकिन खनिज संपदा से कमाई कर चुनावी समर में कूदे राजनीतिज्ञ इससे भी ज्यादा लुटाएंगे।
एमपी की कमाई भी लगेगी यूपी चुनाव में
बांदा। बालू से अपनी तिजोरी भरने वाले कारोबारी बुंदेलखंड और चित्रकूटधाम मंडल तक ही सीमित नहीं है। इनके तार मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी जुड़े हुए हैं। देश की कई चुनिंदा और नामचीन कंपनियां भी बुंदेलखंड में बालू का ठेका हथियाए हुए हैं। उनके साथ यहां के कई राजनीतिज्ञ अपनी साझेदारी किए हुए हैं। कुछ छुटभैया पेटी कांट्रेक्टर के रूप में कमाई कर रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश की कमाई का हिस्सा भी यहां विधानसभा चुनाव में खपेगा।