बांदा। मुझे नहीं पता था कि मैं सुरक्षित आ पाऊंगी भी या नहीं? लेकिन ऊपर वाले का करम है अपने वतन सही सलामत आ गई। भारत सरकार शुक्रिया कि हमें वहां से निकाला। वीजा भी आसानी से मिल गया। यह बात दिल्ली के हवाई अड्डे पर रविवार को दोपहर यूक्रेन से लौटी बांदा शहर की मेडिकल छात्रा अलीशा ने कही।
उसकी आंखों में बीते मंजर का खौफ और सही सलामत वापसी की खुशी के आंसू साफ नजर आ रहे थे। बेटी की अगुवानी के लिए मां-बाप हवाई अड्डे पर मौजूद थे। बांदा की पहली बेटी है जो यूक्रेन से लौटी है।
बांदा शहर के छावनी निवासी ग्राम विकास अधिकारी रफीक मंसूरी की बेटी अलीशा यूक्रेन के क्यू शहर में एमबीबीएस में पहले वर्ष की छात्रा है। पिछले वर्ष ही उसने दाखिला लिया था। यूक्रेन में रूस के हमले के दौरान वह बंकरनुमा मेट्रो स्टेशन पर थी।
इधर, उसके मां-बाप व पूरा खानदान बेहद फ्रिकमंद और रात-दिन दुआएं कर रहे थे। अलीशा से बमुश्किल वीडियो कांफ्रेंसिंग पर बात होती तो वह यही कहती कि उसके लिए दुआ करें। करीब एक पखवारे तक यूक्रेन में बम धमाकों की गूंज ने फंसी रही अलीशा अंतत: रविवार को अपने वतन आ गई। वह कई दिनों से हंगरी के बुडापेस्ट हवाई अड्डे पर थीं।
शनिवार रात वहां से मिली फ्लाइट से चलकर रविवार को दोपहर करीब 12 बजे अलीशा ने अपने देश की धरती दिल्ली में कदम रखा। वहां हवाई अड्डे पर उसकी मां सलमा और पिता रफीक पहले से ही बेताबी से उसका इंतजार कर रहे थे। हवाई अड्डे पर आते ही अलीशा माता-पिता से चिपट गई।
तीनों की आंखों में आंसू छलक पड़े। मां-बाप ने बेटी के सिर पर बार-बार हाथ फेरा और हौसला दिया। हवाई अड्डे पर मीडिया से घिरी अलीशा ने कहा कि हर रात मिसाइल के धमाकों के बीच गूंजती थी। खाने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती थी। भावुक होकर अलीशा बोली- मुझे नहीं पता था कि मैं सेफ आ पाऊंगी कि नहीं? यहां मेरे पैरेंट्स बहुत परेशान थे। ऊपर वाले का करम है कि मैं वतन आ गई।
मीडिया के सवाल पर अलीशा ने भारत सरकार का शुक्रिया अदा किया कि उसे और अन्य छात्र-छात्राओं को वहां से सही सलामत निकालकर अपने वतन पहुंचाया। अलीशा के चाचा अजीज मंसूरी ने बताया कि रविवार की शाम ट्रेन से अलीशा और उसके मम्मी-पापा चलेंगे। अलीशा अपने ननिहाल झांसी में भी एक-दो दिन के लिए रुक सकती है। या फिर सीधे बांदा आएगी।