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‘एक देश-एक भाषा’, तभी हिंदी का सम्मान और उत्थान

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डा.अजय कुमार पांडेय। - फोटो : BANDA
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बांदा। ‘समूची संस्कृति की आग का नाम हिंदी है, सड़क पर खेत में खलिहान में जो काम करते हैं, करोड़ों कंठ के उस राग का नाम हिंदी है’। यह बात मशहूर कवि डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ ने कहीं।
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रविवार को ‘अमर उजाला’ के ‘हिंदी हैं हम’ वेबिनार में कवियों, साहित्यकारों और विद्वानों ने हिंदी के नए आयामों और सोपानों को जोड़कर हिंदी को मातृ भाषा से राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने का राग छेड़ दिया है।
आधुनिकता के इस दौर में बोलचाल से लेकर लेखन तक में हिंदी के साथ अंग्रेजी को मिश्रित करने या फिर अंग्रेजी में हिंदी लिखने को दोष और दुर्भाग्यपूर्ण बताया। लोगों के जेहन में घुस चुकी अंग्रेजियत से बाज आने की नसीहत दी। विद्वानों का कहना है कि चीन, जापान, अमेरिका की तरह हमें भी अपनी बुनियाद मजबूत करने के लिए ‘एक देश-एक भाषा’ पर काम करना होगा। तभी हिंदी को सर्वोच्च मुकाम हासिल हो सकेगा।
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मशहूर कवि चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ ने कहा कि हिंदी भाषा में आशा है। भाषा और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की निधि है। हिंदी को विश्व भाषा का गौरव दिया जा चुका है। जिस तरह से जापान में जापानी, चीन में चीनी तो फिर हिंदुस्तान में हिंदी भाषा क्यों नहीं हो सकती? अंग्रेजी को देश पर जबरन थोपा गया है।
भारत बहुत सी भाषाओं को देश है, मगर हिंदी की अपनी प्रतिष्ठा है। हिंदी को ही राष्ट्रीय आंदोलन के लिए चुना गया। गुजरात में रहने वाले गांधीजी ने भी गुजराती नहीं बल्कि हिंदी भाषा को चुना। यह हिंदुओं की नहीं हिंदुस्तान की भाषा है। मुस्लिम कवियों ने भी हिंदी के उत्थान में अहम योगदान दिए हैं।
हिंदी में इंग्लिश का समावेश देश के लिए दुर्भाग्य
अतर्रा पीजी कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. गया प्रसाद सनेही ने कहा कि हिंदी का अर्थ हिंद है। यह देश का दुर्भाग्य है कि हिंदी को अब तक महत्वपूर्ण स्थान नहीं मिल पाया हैं।
अंग्रेजियत की केचुल हावी होकर रह गई है। इससे हिंदी को अपना मुकाम नहीं मिल पा रहा। उन्होंने कहा कि फैशन परस्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी मातृ भाषा हिंदी को कमजोर करने और अंग्रेजी को बढ़ावा देने का काम किया है। हम हिंदी बोलते तो ठीक हैं, पर शुद्ध हिंदी नहीं लिख पाते। वह इसलिए कि हमने अपनी मातृ भाषा को पहचाना नहीं। उन्होंने हिंदी में अंग्रेजी के समावेश पर गहरी चिंता जताई और इससे बचने की नसीहत भी दी।
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ व सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. शबाना रफीक ने कहा कि हिंदी और उर्दू सगी बहनों की तरह हैं। हिंदी हमारी मातृ भाषा है पर आजादी के 74 वर्ष बाद भी इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका। यह चिंतनीय है। हम प्रांतों में भले बंटे रहें, लेकिन भाषा में न बंटे।
एक देश में एक भाषा होनी चाहिए। अभी हर 200 किमी में भाषा बदल जाती है। देश के हर प्रांत में उनकी भाषा के साथ हिंदी अनिवार्य की जानी चाहिए। तभी हिंदी का महत्व बढ़ेगा और उसे अपना मुकाम मिल सकेगा। अपनी कविता ‘हिंदी की प्यारी बिंदी होगी, उर्दू का होगा जेर-जबर’ से हिंदी को उचित सम्मान दिलाने की बात कही।
राजकीय हाईस्कूल, बड़ोखर बुजुर्ग की प्रधानाचार्य डॉ. शशि मिश्रा ने कहा कि भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। फिर भी इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पा रहा। राष्ट्र की ताकत उसकी भाषा से होती है।
बिना मातृभाषा के राष्ट्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हिंदी को दर्जा दिलाने के लिए अंग्रेजियत से परहेज करना होगा। भूमि, जन्म और संस्कृति यह राष्ट्र की धरोहर होती है। इसे सहेज कर रखने से ही हम हिंदी को सम्मान दिला सकते हैं। हिंदी के छोटे से छोटे वर्णमाला को समझने की जरूरत है। हमें हिंदी को बोलने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। तभी हिंदी को उसका स्थान मिलेगा।
पंडित जेएन महाविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. संदीप सिंह ने कहा कि भाषा का गुण परिवर्तनशील है। उसका भौतिक, भौगोलिक अंतिम स्वरूप नहीं है। कविता में खड़ी बोली का प्रयोग अमीर खुसरो ने किया था।
हिंदी भाषा के उत्थान में फिल्म जगत ने भी काफी कुछ काम किया है। बिना भाषा के संस्कृति का ज्ञान नहीं हो सकता। भाषा का अब बाजारीकरण हो रहा है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे हमें बचने की जरूरत है। सब मिलकर प्रयास करें तो हिंदी को नया आयाम मिल सकता है। प्रांतों की भाषा भले ही अलग-अलग हो, लेकिन देश की भाषा एक होनी चाहिए। हिंदी को पूरे देश को दिल से स्वीकार करना चाहिए।
आरएन इंस्ट्टीयूट ऑफ एडवांस स्टडीज के प्राचार्य डॉ. अजय कुमार पांडेय ने कहा कि स्कूलों में अभिभावकों से पूछा जाता है कि क्या आपको अंग्रेजी का ज्ञान है? अगर अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होता तो बच्चे का दाखिला नहीं किया जाता। यह मानसिकता हिंदी के लिए अच्छी नहीं है।
उदाहरण देते हुए कहा कि घरों में सेब की जगह एपल और केला की जगह बनाना सिखाया जा रहा है। हिंदी में अंग्रेजियत का प्रयोग शान समझी जाती है। इससे हम मातृभाषा को खोखला कर रहे हैं। अंग्रेजी भी सीखिए पर अपनी मातृभाषा को मत भूलिए। अन्यथा हिंदी और अंग्रेजी के मिले-जुले स्वरूप से नई भाषा का जन्म हो सकता है।

डा.गया प्रसाद सनेही।- फोटो : BANDA

डा.शबाना रफीक।- फोटो : BANDA

डा.शशि मिश्रा।- फोटो : BANDA

डा.संदीप सिंह।- फोटो : BANDA

चंद्रिका दीक्षित ललित।- फोटो : BANDA

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