बांदा। बकस्वाहा जंगल को बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी न रात देख और न ही दिन। जंगल के दो लाख से ज्यादा पेड़ कटने से बचाने के लिए अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं।
बकस्वाहा जंगल के हरेभरे दरख्तों और उनकी ओट में सो रहे सैकड़ों पक्षी व जीव जंतु शनिवार की आधी रात अचानक फड़फड़ा उठे। उनके कानों में गूंजे नारों ने उन्हें चौंका दिया। इसी नजारे के बीच बकस्वाहा जंगल में आदिवासियों और पर्यावरण योद्धाओं ने कैंडल जलाकर रात्रि चौपाल लगाई।
एलान किया कि किसी भी कीमत पर बकस्वाहा का जंगल वीरान नहीं होने देंगे। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हीरा खदान में तब्दील किए जाने का देशव्यापी विरोध चल रहा है।
इससे प्रभावित होने वाले आदिवासी ग्रामीणों सहित कई पर्यावरण पैरोकार संगठन और पर्यावरणविद इसमें शामिल हैं। पिछले करीब पांच माह से आंदोलन में लगातार तेज आ रही है।
हाईकोर्ट और एनजीटी तक यह प्रकरण पहुंच चुका है। बीती रात बकस्वाहा जंगल क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य मानकी गांव में आधी रात को कैंडल लेकर चौपाल लगाई गई।
जंगल बचाओ अभियान की श्रृंखला में यह आयोजन दो दिवसीय चल रहे मंथन शिविर में हुआ। देश के कई पर्यावरण पैरोकार इसमें शामिल थे। पर्यावरण विद विजया दीदी ने कहा कि दो दिवसीय शिविर में यह रणनीति बनेगी कि बकस्वाहा जंगल में प्रस्तावित हीरा खदान कैसे वापस हो।
उन्होंने कहा कि आंदोलन इतना तेज होगा कि सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ेगा। पर्यावरण प्रेमी सारे संगठन एकजुट होकर लड़ेंगे और इसे मुद्दा बनाएंगे।
जंगल उजाड़ने का सरकार को हक नहीं
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान के खास कार्यकर्ता और पीपल-नीम-तुलसी अभियान (बिहार) के डा. धर्मेंद्र कुमार ने रात्रि चौपाल में कहा कि जंगल सरकार ने नहीं बना दिया। इसे पशु-पक्षियों और आदिवासियों ने संरक्षित किया है। इसे उजाड़ने का सरकार को कोई हक नहीं बनता।
पंचतत्व में जंगल भी शामिल है। उन्होंने कहा कि विकास का पैमाना तय होना चाहिए। बताया कि तीन मई से बकस्वाहा जंगल बचाने के मुद्दे पर पूरे देश में आंदोलन चल रहा है। हम लोग जंगल में बसे 15 गांवों में बारी-बारी से पहुंच रहे हैं और वहां के आदिवासियों से बात कर रहे हैं।
शैल चित्रों पर हाईकोर्ट में सुनवाई आज
बकस्वाहा जंगल की चट्टानों में लगभग 25 हजार वर्ष पुराने शैल चित्रों को बचाने के लिए दायर की गई रिट याचिका में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट सोमवार (27 सितंबर) को सुनवाई करेगा। इसके पूर्व जुलाई माह में हाईकोर्ट ने सुनवाई की थी।
समाजसेवी डा. पीजी नाजपांडे ने अपने अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा के माध्यम से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर) में जनहित याचिका दायर करके बकस्वाहा जंगल की रॉक पेंटिंग को पाषण युग और मानव इतिहास पूर्व काल की बताते हुए इन्हें संरक्षित किए जाने के लिए कई दलीलें दी थीं।
हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और एमपी सरकार से जवाब मांगा था। एएसआई की टीम ने 10 से 12 जुलाई तक बकस्वाहा जंगल के शैल चित्रों का सर्वेक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट को जुलाई माह में सौंपी थी।
हाईकोर्ट ने 24 जुलाई को अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता डा. नाजपांडे ने बताया कि हाईकोर्ट में इसकी सुनवाई सोमवार 27 सितंबर को होगी।
वर्चुअल कार्यशाला में मंथन
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान मुद्दे पर पर्यावरण प्रेमियों की वर्चुअल कार्यशाला में पर्यावरण प्रेमियों ने नैनागिरी में इसी माह होने वाले मंथन शिविर में भाग लेने और वहां जो भी निर्णय लिए जाएं उस पर अमल करने का संकल्प लिया।
कार्यशाला का संचालन कर रहे पंजाब के अनुराग विश्नोई ने बताया कि पर्यावरण प्रेमियों के सुझावों और विचारों पर गहन मंथन हुआ। अध्यक्षता डा. धर्मेंद्र कुमार ने की।
इस मौके पर आनंद पटेल, धर्म दीपक, डा. ओपी चौधरी, अजय सिंह, राजेश यादव, आलोक, शिखा श्रीवास्तव, लीला, सुमित राठौर, काजल इंदौरी, प्रवीण, अभिषेक, आशिक मंसूरी, विशाल जैन, सीमा विश्वकर्मा आदि शामिल रहे।
100 करोड़ वृक्ष मिशन में बांट रहे पौधेे
सरकार स्थलों पर जहां जंगलों के सफाई की योजनाएं चल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कई पर्यावरण प्रेमी संगठन हरित क्रांति का मिशन छेड़े हुए हैं। ‘भारत मिशन 100 करोड़ वृक्ष’ की पीपल टीम लोगों को निशुल्क तुलसी और पीपल के पौधेे बांट रही है।
पौधरोपण को प्रेरित करने वाली प्रिंट सामग्री भी वितरित कर रही है। रवि श्रीवास्तव, आशीष उदैनिया, सुशांत प्रिया, रोहित उपाध्याय और मीडिया प्रभारी तृप्ती शामिल रहीं।