चुनावी चकल्लस में लोग भले ही भुला बैठें पर आज (19 अप्रैल) का दिन बुंदेलखंड के लिए बड़ा खास है। 161 वर्ष पहले आज ही के दिन अंग्रेजी फौज से मोर्चा ले रहे नवाब बांदा की फौज के 800 सैनिक शहीद हो गए थे। 300 क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की फौज ने भूरागढ़ दुर्ग में फांसी पर लटका दिया था।
स्वतंत्रता के महासंग्राम की निशानियों में बांदा शहर की सीमा पर केन नदी किनारे स्थित भूरागढ़ दुर्ग आज भी क्रांतिकारियों और शहीदों की शहादत और क्रांतियों का गवाह है। बात 1858 की है। अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति परवान पर थी। इसी बीच सागर (एमपी) से छतरपुर होते हुए भारी-भरकम अंग्रेजी फौज बांदा के लिए चल पड़ी।
बांदा में तब नवाब अली बहादुर सानी (द्वितीय) की हुकूमत थी। नवाब ने यह हुकूमत बिहार के क्रांतिकारी कुंवर सिंह, तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई आदि के सहयोग से 15 जून 1857 को अंग्रेजों को खदेड़कर हासिल की थी। सागर से बांदा के लिए अंग्रेजी फौज के कूच करने की खबर नवाब अली बहादुर को मिली तो वह चिंतित हो गए।
क्योंकि उनकी फौज का एक बड़ा हिस्सा रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की मदद के लिए गया हुआ था। नवाब अपने पास उपलब्ध बची फौज और आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों को साथ लेकर अंग्रेजी फौज से मोर्चा लेने के लिए निकल पड़ा। महोबा पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया।
नवाब की मोर्चाबंदी की भनक लग जाने पर अंग्रेजी फौज की कमान संभाले कमांडर जीसी व्हिटलाक ने चाल चली और रास्ता बदलकर खजुराहो, खड्डी पहरा, कबरई होते हुए बांदा का रास्ता पकड़ा। नवाब को पता चला तो तुरंत फौज लेकर लौट आए और भूरागढ़ दुर्ग के नजदीक गोयरा मुगली गांव के पास ग्वाइन नाले के नजदीक अंग्रेजी फौज का सामना किया। बताते हैं कि अंग्रेजी फौज में लगभग 1900 सशस्त्र सैनिक थे।
यह युद्ध करीब सात घंटे चला। तमाम शस्त्रों, तोप, गोला-बारूद आदि से लैस अंग्रेजी फौज के आगे नवाबी फौज और क्रांतिकारी ज्यादा देर नहीं टिक सके। बांदा गजेटियर के मुताबिक इस युद्ध में करीब 800 क्रांतिकारी अंग्रेजी फौजों के हाथों मारे गए। अंग्रेजी फौज ने 300 क्रांतिकारियों को पकड़ लिया और उन्हें भूरागढ़ दुर्ग लाकर यहां फांसी पर लटका दिया। इसी के साथ बांदा में फिर अंग्रेजीराज कायम हो गया और मिस्टर मेन यहां कलेक्टर बन गए।