बलरामपुर। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अस्पतालों की दशा में सुधार नहीं हो पा रहा है। डाक्टर व स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही व भ्रष्टाचार का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है।
जिले की सीएचसी उतरौला में प्रसव होने पर टांका लगाने के लिए ग्लब्स व सूई के नाम पर 1100 रुपये की वसूली की जाती है। लाइट न होने पर मरीजों का एक्स-रे नहीं किया जाता है। पैरासिटामॉल जैसी दवाएं भी मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ती है। अमर उजाला की टीम ने बुधवार को अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं की पड़ताल की।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर आये दिन गायब रहते हैं। बुधवार को भी डॉ. सीमा यादव अपने कक्ष में मौजूद नहीं मिलीं। महिला डाक्टर मौजूद न होने के कारण अस्पताल में इलाज के लिए आईं कुछ महिला मरीजों को निराश होकर वापस लौटना पड़ा। महिला डाक्टर के बारे में स्वास्थ्य कर्मियों ने बताया कि वह ट्रेनिंग पर गई हैं।
विभागीय अधिकारी सरकारी अस्पतालों में सभी दवाएं उपलब्ध होने का दावा भले ही करें लेकिन हकीकत कुछ और ही है। सीएचसी उतरौला में अधिकांश डाक्टर मरीजों को प्राय: बाहर की ही दवा लिखते हैं।
मरीजों को बीटाडिन व पैरासिटामॉल जैसी दवाएं भी बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। अस्पताल में इलाज के लिए आई ग्राम गोकुला माफी निवासिनी पुष्पावती ने बताया कि उसे सर्दी, जुकाम व बुखार है। डॉक्टर ने जांच के बाद बाहर की दवा लिखी है। बाहर मेडिकल स्टोर से 180 रुपये की दवा खरीदी है।
अस्पताल में जनरेटर की सुविधा होने के बावजूद मरीजों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। गौरा चौराहा क्षेत्र के ग्राम नौबस्ता से इलाज के लिए आये रोहित कुमार ने बताया कि डॉक्टर ने एक्स-रे लिखा है। एक्स-रे रूम में गया तो वहां मौजूद कर्मचारी ने बताया कि लाइट नहीं है। जनरेटर चलाकर एक्स-रे नहीं किया जाएगा। जब बिजली आएगी तभी एक्स-रे हो पाएगा। जल्दी हो तो बाहर से एक्स-रे करवा सकते हो।
स्वास्थ्य विभाग जहां एक तरफ संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रहा है वहीं अस्पताल में प्रसूता के परिवारों से सुरक्षित प्रसव के नाम पर धन उगाही की जा रही है। गरीब नगर निवासी हलीम ने बताया कि अपनी पत्नी अफसाना को प्रसव के लिए सीएचसी उतरौला में भर्ती कराया हूं। अस्पताल में प्रसव में टांका लगाने के लिए ग्लब्स व सूई के नाम पर 1100 रूपये वसूला गया है।
सीएचसी उतरौला में शुद्ध पेयजल के लिए बनाए गये पानी की टंकी का संचालन नहीं हो रहा है। पानी की टंकी का संचालन न होने पर अस्पताल में पेयजल के लिए हैंडपंप ही एक मात्र सहारा है। हैंडपंप भी आए दिन खराब हो जाता है। सही होने पर भी पानी शुद्ध नहीं आता है। ऐसे में मरीजों को पानी पिलाने के लिए तीमारदारों को बोतल का पानी खरीदना पड़ता है।