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कभी चुनाव आते ही झंडे - बिल्ले से पट जाते थे गांव

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बलिया। पहले चुनाव की तिथि घोषित होते ही गांव-गांव में प्रत्याशी और उनके समर्थकों का आना जाना शुरू हो जाता था। संसाधन कम थे इसलिए हर किसी तक पहुंचाना प्रत्याशियों के लिए मुश्किल होता था। ऐसे में प्रमुख जिम्मेदारी गांव के मुखिया यानी सरपंच की होती थी। प्रत्याशी या बड़े नेता इन्हीं के यहां जाते थे। गांव के बच्चे पता करते थे कि कब किस पार्टी के नेता आ रहे हैं। जैसे ही आते तो उनके आगे-पीछे घूमने लगते। उनसे बिल्ला, झंडा और दरवाजे पर चस्पा करने के लिए छोटी पर्ची ले लेते थे। उसी पर प्रत्याशी का नाम और चुनाव चिह्न लिखा होता था। अब तो ये सब बस कहने-सुनने की बातें हैं। संवाद
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बासंडीह विधानसभा के शिवपुर गांव निवासी महाप्रसाद चौबे बताते हैं कि जब पहला चुनाव हुआ तो वह10 साल के थे। उस समय और उसके बाद के चुनाव में बच्चों के अंदर गजब का उत्साह था। बच्चे यह नहीं देखते थे कि किस पार्टी का बिल्ला बंट रहा है। प्रत्याशी भी बिल्ला देकर अपना संदेश हर घर तक पहुंचा देते थे। इतना नहीं पोस्टर, बिल्ला, झंडा जुटाने की बच्चों में होड़ रहती थी। अब तो ये सब गायब हो गया। ज्यादातर चुनाव प्रचार साइकिल से ही होता था। बड़े नेता आते थे तभी जीप आदि आती थी। पहले जिस गांव में जीप आती थी उसे देखने के लिए गांव के सभी बच्चे इकट्ठा हो जाते थे। अब वैसा नहीं दिखता। यहीं वजह है कि चुनाव को लेकर बच्चों में उत्साह कम हुआ है। किसी भी बात को पहुंचाने के लिए बच्चे सबसे अच्छे माध्यम होते हैं।
बांसडीह विधानसभा क्षेत्र के गोपालपुर कलां निवासी रमाकांत यादव बताते हैं कि आजादी के बाद पहला चुनाव 1952 में हुआ था। उस समय बलिया गाजीपुर जिला में था। इसलिए वहीं नजदीक के लोग ही चुनाव लड़ते थे। जिसे क्षेत्र की जनता सम्मान देकर विजय श्री दिलवाता था। जनता का कोई काम विधायक से पड़ने पर लोग मुखिया से कहते थे। वह काम अपने घर बुला कर कराते थे। चुनाव में भी लोग मुखिया के बाद का सम्मान करते थे। पहले लालच और फरेब नहीं था। न तो प्रत्याशी में न ही मतदाता में वोट डालने के लिए अब चार पहिया वाहन का इस्तेमाल हो रहा है। पहले लोग पैदल ही जाते थे। पहले केंद्र पर एक दो पुलिस और गांव के चौकीदार के संरक्षण में सकुशल वोट बैलेट बाक्स में पड़ता था। अब बड़े ही चुनाव में उत्सुक रहते हैं। या वही लोग होते हैं जिनके घरों में राजनीति चर्चाएं होती हैं।
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