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क्षतिग्रस्त पुल के मरम्मत की आस जगी

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बलिया। भरौली-बक्सर के बीच गंगा पर बना पुल पिछले साढ़े सात वर्षों से क्षतिग्रस्त है। इसके चलते पुल पर भारी वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित है, लेकिन अब इसके निर्माण की उम्मीद जगी है। लेकिन अभी लोगों को एक वर्ष इंतजार करना होगा। नए पुल का संचालन होने बाद क्षतिग्रस्त पुल का मरम्मत कर चालू किया जाएगा।
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उत्तर प्रदेश के भरौली व बिहार के बक्सर तक गंगा पर स्थित कुंवर वीर बहादुर सिंह सेतु का शुभारंभ 15 जुलाई 1977 को हुआ था। हालांकि समय-समय पर पुल क्षतिग्रस्त होता रहा और मरम्मत भी होती रही। लेकिन वर्ष 2012 में जब बिहार की ओर से आ रहे लाल बालू के ट्रकों से टैक्स वसूली के लिए वन विभाग की ओर से भरौली में चेक पोस्ट स्थापित किया तो घंटों लोडेड ट्रक पुल पर ही खड़ी होने लगी। आलम यह रहा कि वर्ष 2014 में पुल काफी क्षतिग्रस्त हो गया। पुल के आर्म्स के बीच लगे ज्वाइंटर खराब होकर नष्ट हो गए। इसके अलावा भारी वाहनों के आते-जाते आर्म्स का उतार-चढ़ाव भी काफी अधिक हो गया और दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ गई। पुल के रखरखाव व मरम्मत की जिम्मेदारी बिहार सरकार के पास है लिहाजा पुल पर भारी वाहनों का आवागमन बंद करने की कवायद शुरु की गई और 12 मई 2014 की रात में पुल के दोनों सिरे पर लोहे की बैरिकेडिंग लगा दी गई। करीब साढ़े पांच साल पहले इलाहाबाद की एक एजेंसी को पुल मरम्मत की जिम्मेदारी दी गई और महीनों तक मरम्मत कार्य चला। लेकिन पुल का संचालन सुचारु रूप से शुरू नहीं हो सका। हालांकि इसके मरम्मत की आस जग गई है। एनएचएआई के अधिकारी की मानें तो पुल पर आवाजाही के दौरान ठीक से मरम्मत संभव नहीं है। इसलिए नए पुल का संचालन शुरु होने के बाद इस पुल पर आवागमन बंद कर मरम्मत किया जाएगा। दोनों ही पुल संचालित होंगे। हालांकि अभी लोगों को इंतजार करना होगा। दिसंबर 22 में नए पुल का संचालन होने बाद ही क्षतिग्रस्त पुल के मरम्मत का कार्य शुरु किया जाएगा, ताकि यूपी-बिहार के बीच आवागमन प्रभावित न हो सके।
गड़हांचल के दर्जनों गांवों के लिए मुख्य बाजार है बक्सर
बलिया। यूपी व बिहार की सीमा से सटे गड़हांचल के दर्जनों गांवों का मुख्य बाजार बक्सर (बिहार) ही है। इसके अलावा सीमावर्ती गाजीपुर जिले के करीब 20 गांवों के लोग भी मुख्य खरीदारी के लिए बक्सर बाजार का ही रुख करते हैं। इन गांवों के छोटे व बड़े कारोबारी भी थोक सामानों की खरीदारी बक्सर से ही करते हैं। लेकिन बैरिकेडिंग के चलते छोटे मालवाहक वाहन भी नहीं चल पा रहे हैं लिहाजा सामानों को ले आने के लिए रिक्शा व ठेले का सहारा लेना पड़ता है जो काफी महंगा होता है। इसके अलावा शादी-विवाह के दिनों में बक्सर के रास्ते जाने वाले बसों को करीब 116 किमी अतिरिक्त गाजीपुर होकर सफर करना पड़ता है।
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पुल के बंद होने से लाल बालू का आवक प्रभावित, हुआ महंगा
बलिया। भरौली-बक्सर गंगा पुल के बंद होने का सबसे अधिक लाल बालू के आवक पर हुआ है और इसके चलते जनपद में लाल बालू काफी महंगा हो गया है। लाल बालू की मुख्य खदान बिहार के कोईलवर में है। कोईलवर से यूपी की सीमा में प्रवेश के लिए सबसे नजदीक रास्ता बक्सर-भरौली गंगा पुल ही है। पुल के बंद होने के पहले करीब तीन सौ ट्रकें रोजाना लाल बालू लेकर प्रदेश की सीमा में प्रवेश करती थीं और इसी रास्ते गाजीपुर, मऊ, गोरखपुर, गोंडा, आजमगढ़ आदि जनपदों में लाल बालू पहुंचता था। लेकिन पुल के बंद होने के कारण ट्रकें गाजीपुर या जयप्रभा सेतु मांझी के रास्ते आ रहीं हैं लिहाजा खर्च बढ़ने के कारण लाल बालू भी महंगा हो गया है।
जनप्रतिनिधियों की ओर से नहीं उठ रही आवाज
बलिया। साढ़े सात वर्ष से बंद भरौली-बक्सर गंगा पुल पर भारी वाहनों के आवागमन शुरू कराने को लेकर जनप्रतिनिधि भी चुप्पी साधे हुए हैं। बताया जाता है कि यूपी के बलिया व बिहार के बक्सर के सांसद केन्द्र में सत्ता पक्ष से संबंधित हैं, इसके बावजूद साढ़े सात वर्ष से अधिक समय से बंद पुल को चालू कराने को लेकर कवायद नहीं की जा रही है जबकि यूपी में भाजपा की सरकार है तो वहीं बिहार में भाजपा समर्थित सरकार है।
यूपी-बिहार के बीच आवागमन को पूरी तरह बंद किया जाना संभव नहीं है। नए पुल का संचालन शुरु होने के बाद क्षतिग्रस्त पुल का ठीक से मरम्मत कर इसे चालू किया जाएगा। प्रत्येक पुल से दो लेन की यातायात होगी।
- आरके तिवारी, ब्रिज इंजीनियर, एनएचएआई, बक्सर।
अंग्रेजों के जमाने का रेल पुल ही सहारा
--नौ साल से अधर में है नया पुल का निर्माण
संवाद न्यूज एजेंसी
बलिया/जयप्रकाशनगर। यूपी व बिहार को जोड़ने वाले बलिया-छपरा रेल खंड अंग्रेजों के जमाने का बना रेल पुल ट्रेनों के आवागमन का सहारा है। 165 वर्ष बाद भी दूसरा रेल पुल नहीं बन सका है। हालांकि एक पुल बन रहा है जो 9 वर्षों से अधर में लटका है। अब एक ओर रेलवे दोहरीकरण व विस्तार तो कर रहा है लेकिन अगर दूसरा पुल नहीं बना तो यह योजना बकुल्हा रेलवे स्टेशन पर ही जाकर रुक जाएगी।
आजादी के पूर्व अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1856 में बकुल्हा-मांझी रेेलवे स्टेेेशन के बीच सरयू नदी पर रेल पुल का निर्माण करवाया गया था। उस समय इस पुल का निर्माण मात्र छोटी लाइन की ट्रेनों के परिचालन के लिए हुआ था। करीब ढाई दशक पहले इस पुल पर बड़ी लाइन की ट्रेनों के परिचालन लायक पटरी बनाई गई। आज भी इस बूढ़े पुल से एक्सप्रेस ट्रेनों व मालगाड़ियों का आवागमन जारी हैै। क्षेत्र के बुजुर्गों की मानें तो वर्ष 1933 में आए भूकम्प के झटके से इसके दो पाए क्षतिग्रस्त हो गए थे। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मरम्मत कराकर पुन: पुल पर आवागमन बहाल करा दिया था। उधर, इस पुल से करीब 20 मीटर की दूरी पर नए रेल पुल का निर्माण कार्य वर्ष 2012 में 300 करोड़ की लागत से शुरु हुआ। अब तक पुल का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा ही निर्माण हो सका है। ऐसे में 165 साल पुराना पुल अब भी सहारा बना हुआ है जिससे गुजरते वक्त यात्रियों में दहशत बनी रहती है।
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यह अंग्रेजों के जमाने का पुराना रेल पुल है। इसके स्थान पर नया रेल पुल अति आवश्यक है क्योंकि इस रूट से रोजाना दर्जनों ट्रेनों का परिचालन होता है। हालांकि इस समय ट्रेनें कम चलाई जा रही हैं फिर भी रेल विभाग को इसके प्रति गंभीर होना आवश्यक है।
- संजय यादव
समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर नए रेल पुल के निर्माण का कार्य क्यों नहीं रफ्तार पकड़ पा रहा है। पुराने जर्जर रेल पुल के स्थान पर लगभग नौ वर्ष पूर्व नया रेल पुल बनना शुरु भी हुआ तो आज तक अधर में लटका है।
- नागेंद्र प्रसाद सिंह
सरयू नदी पर स्थित रेल पुल काफी जर्जर हो गया है। इसकी स्थिति को देखते हुए विभाग को नए रेल पुल बनाने के लिए कार्य में तेजी लानी चाहिए। जर्जर पुल से ट्रेनों के गुजरते समय लोगों की सांसे अटक जाती हैं।
- माधवेन्द्र प्रताप सिंह
बकुल्हा-मांझी पर नया रेल पुल निर्माण शुरु हुआ तो लोगों की उम्मीद भी जगी। लेकिन निर्माण कार्य की अपेक्षित गति न होने के कारण लगता है कि लोगों को अभी काफी समय तक इंतजार करना पड़ेगा।
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- राजकिशोर यादव
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