गांव से निकल सकते हैं रोनाल्डो और माबापे...
इन महिला फुटबॉल खिलाड़ियों की पारिवारिक हालात बहुत अच्छी नहीं है। इसके बावजूद भी महिला खिलाड़ियों की फुटबॉल के प्रति रुचि और दृढ़ विश्वास उनके सपनों को पंख लगा रहा है।
फुटबॉल प्रेमियों का कहना है कि पहले हर गांव में एक पुरुष फुटबॉल टीम जरूर हुआ करती थी। गांवों में एक-दो बार बड़े आयोजन होते थे। बदलते समय के साथ धीरे-धीरे यह खेल गांवों को विलुप्त हो रहा है। ऐसे में बेटियों का फुटबॉल खेल के प्रति ऐसा जुनून देखते बनता है।
गांव में फुटबॉल के लिए ऐसा माहौल तैयार हुआ है कि अच्छी खासी तादाद में बेटियां प्रतिदिन मैदान में समय से रिहर्सल करती नजर आती हैं।
बेसिक शिक्षा के खेल अनुदेशक रामप्रकाश यादव जनपदीय रैली में बच्चों के साथ हिस्सा लेने जाते थे। वहीं से खेल और फुटबाल के प्रति ललक रामप्रकाश और बच्चियों के अंदर पैदा हुई। नियमित अभ्यास से राष्ट्रीय स्तर की प्रतिभाएं निकलने लगीं। सफलताएं मिलीं तो मनोबल बढ़ा। यहां की बच्चियां नेशनल स्तर तक पहुंच गई।
कठिन था संघर्ष
खेल अनुदेशक रामप्रकाश ने बताया कि बहुत कठिन संघर्ष का सामना करना पड़ा। लोक-लाज की वजह से लोग बच्चियों को खेलने से मना करते थे, लेकिन यदि कुछ कर गुजरने का जुनून है तो कुछ भी संभव है। समय ने सब कुछ आसान कर दिया। शुरुआत में बच्चियों ने खोखो, कबड्डी, वालीबाल खेला।
इसी बीच फुटबॉल खेलने की जिज्ञासा पैदा हुई। कई चोटिल होने की वजह से डरने लगीं। शुरू में चार खिलाड़ी आंचल, निगम, प्रीति व नीतू पांडेय ने बूट पहनकर फुटबॉल खेलना शुरू किया। अन्य बच्चियों में चोटिल होने का भय समाप्त होने लगा।