बलिया। जिले में दो दिनों से रुक-रुक कर हो रही बूंदाबांदी से गेहूं, दलहन की फसल को लाभ पहुंचा है जबकि तिलहन को नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। सरसों, राई और तोरई में माहूं रोग लगने की आशंका जताई जा रही है।
जिला कृषि अधिकारी विकेश कुमार ने बताया कि जिले में कुल 179999 हेक्टेयर में कुल 8 तरह की फसल बोई गई है। हालांकि नुकसान का सही आंकलन मौसम साफ होने के बाद ही लग सकेगा। उन्होंने बताया कि बूंदाबांदी से गेहूं, मसूर, मक्का, जौ और मटर को लाभ पहुंचेगा। जिले में 137591 हेक्टेयर में गेहूं की फसल बोई गई है। बाढ़ के कारण कई क्षेत्रों में तो विलंब से बोआई की गई है। बूंदाबांदी से गेहूं की फसल को लाभ होगा। जिन किसानों ने सिंचाई नहीं की है उनको राहत भी मिलेगी। दलहनी की फसल मसूर कुल 23890 हेक्टेयर में बोई गई है। बूंदाबांदी व कोहरा इस फसल के लिए लाभदायक है। 4784 हेक्टेयर में मक्का की फसल बोई गई है। बाढ़ के कारण कई इलाकों में देर से बोआई हुई है। बूंदाबांदी से इस फसल को कोई नुकसान नहीं बल्कि फायदा ही है। 4066 हेक्टेयर में जौ के फसल की बोआई हुई है। बूंदाबांदी इस फसल के लिए लाभदायक है।
मटर 3963 हेक्टेयर में मटर में बोया गया है जिसे बूंदाबांदी से लाभ होगा। चना की फसल कुल 3268 हेक्टेयर में बोई गई है। इस फसल की भी सिंचाई नहीं होती है लेकिन कोहरा व समय-समय पर बूंदाबांदी से ही फसल तैयार होती है। तिलहनी फसल तोरिया की बोआई कुल 1268 हेक्टेयर में की गई है। इस फसल को भी बूंदाबांदी से कोई खास असर नहीं होगा। लगातार बादल छाये रहने से माहूं के प्रकोप की आशंका रहती है। जिले में1169 हेक्टेयर में राई व सरसों के फसल की बोआई की गई है। इस फसल पर भी बूंदाबांदी का कोई खास असर नहीं होगा बल्कि लाभदायक की होगा।
फसलों को बीमारियों से बचाने के दिए टिप्स
बलिया। कृषि निदेशालय के रक्षा अनुभाग ने बूंदाबांदी से आई तापमान में गिरावट के कारण रबी की फसलों में कीट एवं रोग लगने की आशंका जताई है। साथ ही बचाव के टिप्स दिए हैं। किसानों को बताया गया है कि गेहूं की फसल में पीली गेरुई, चना, मसूर व मटर में सेमीलूपर, फली छेदक, पत्ती धब्बा रोग के साथ-साथ राई सरसों में माहू, लीफ माइनर, तुलासिता व अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा के प्रकोप की आशंका है। गेहूं में पीली गेरुई रोग के उपचार के लिए प्रोपीकोनाजोल 25 फीसदी500 मिली मात्रा को 600-700 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए। राई सरसों में माहूं से बचाव के लिए एजाडिरैक्टिन या डाईमेथोएट या ऑक्सीडिमेटान मिथाइल 25 फीसदी 10 लीटर को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। चना, मटर, मसूर पर सेमीलूपर रोग लगने पर बैसिलस थ्यूरिजियेनसिस, एजाडिरैक्टिन के 25 फीसदी को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव व रासानिक नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 प्रतिशत दो लीटर को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। एस्कोकाइटा ब्लास्ट यानी पत्ती धब्बा रोग से बचाव को मैनकोजेब या कॉपरऑक्सी क्लोराइड का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
सुझाई गई दवाएं उपलब्ध नहीं
बलिया। कृषि निदेशालय ने बारिश से तापमान गिरने के कारण होने वाले रोगों से फसलोें को बचाने के लिए जिन दवाओं का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया है वे उपलब्ध नहीं है। इस बाबत जिला कृषि रक्षा अधिकारी प्रियानंदा ने बताया कि जिले में कीटनाशक में केवल कयूनालफॉस और और गेहूं के लिए खरपतवार नाशक तथा बायो पेस्टीसाइड्स है।
ओलावृष्टि से किसान चिंतित
विशुनपुरा। क्षेत्र में दो दिन से हो रही बूंदाबांदी के बीच जहां किसानों के चेहरे खिल उठे है। वहीं कड़ाके की सर्दी ने लोगों को घरों में दुबकने पर मजबूर कर दिया है। बुधवार की रात हुई ओला वृष्टि से किसानों के चेहरे की चमक फीकी पड़ गई है। बुधवार की दोपहर से शुरू हुई हल्की वर्षा किसानों की फसलों के लिए वरदान साबित हुई है। बारिश के चलते तापमान में आई भारी गिरावट से सर्दी का कहर भी देखने को मिल रहा है। बरसात के कारण पारा भी गिर गया। जिसके चलते सर्दी के कहर से लोगों का घर से निकलना भी मुश्किल हो रहा है। लोग जगह-जगह अलाव जलाते नजर आए। वहीं, बाजारों में रौनक न के बराबर ही दिखाई दी। वहीं बुधवार की रात क्षेत्र के मालीपुर, खंदवा, जमुआव आदि गावोंमें पड़े ओले से दलहनी फसलों के फूल झड़ गए है। सब्जियों पर भी ओले गिरने का असर हुआ है। जिससे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच गई है।
ठंड और भीषण शीतलहर से आमजन त्रस्त
बेल्थरारोड। गलन भरी ठंड और भीषण शीतलहर का प्रकोप जारी रहने से लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। घने कोहरे के चलते सड़कों पर वाहनों की रफ्तार धीमी पड़ गई और लोगों की आवाजाही कम रही। इस बीच आसमान से हल्की बूंदाबांदी से तापमान में गिरावट दर्ज की गई, जिससे ठंड बढ़ गई है। इस बीच मौसम के बदले मिजाज से किसानों के होश उड़ गए हैं। गेहूं के लिए मौसम को अनुकूल माना जा रहा है, लेकिन दलहनी फसलों के लिए मौसम नुकसान साबित हो सकता है। इस दौरान ठंड के बीच कांपते हुए बच्चे स्कूल जाने को विवश हैं। ठंड के चलते लोग बहुत जरूरी कार्य से ही घर से बाहर निकल रहे हैं। ठंड से बचाव के लिए नगरीय क्षेत्र में अलाव जलाने और रैन बसेरा में आवश्यक इंतजाम किए गए हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अलाव की समुचित व्यवस्था नहीं किए जाने से लोगों में नाराजगी है।