बहराइच। कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग में बीते दो साल से तेंदुओं का हमला बढ़ता जा रहा है। हर माह तेंदुआ किसी न किसी ग्रामीण व बच्चे को अपना निवाला बनाने के लिए हमला कर रहा है। दो साल में 80 लोगों पर तेंदुआ हमला कर चुका है, जबकि 11 लोगों को निवाला बना चुका है। तेंदुए के बढ़ते हमलों से ग्रामीणों में दहशत बढ़ती जा रही है। वहीं, वन विभाग के पास सबसे बड़ी चुनौती जंगली जानवरों और ग्रामीणों दोनों को बचाने की है। वह भी तब जबकि उसके पास पर्याप्त संसाधन ही नहीं हैं। ऐसे में बेबसी साफ समझी जा सकती है। बस जागरुकता के सहारे वन विभाग अपना फर्ज निभा रहा है।
कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग 551 वर्ग किलोमीटर में फैला है। प्राकृतिक छटा निहारने के लिए व बाघ और तेंदुआ देखने के लिए विदेशों से सैलानियों का जमावड़ा लगता है। सैलानी बाघ व तेंदुआ देखने के साथ सैर-सपाटा भी करते हैं, लेकिन जंगल से सटे गांवों में निवास करने वाले ग्रामीणों के लिए तेंदुओं का आगमन आतंक बना हुआ है। जंगल से सटे गांव पकड़ियादीवान, निबियागौड़िया, भैंसाही, भवानीपुर, सेमरीमलमला, नौबना, रामपुरवा रेतिया, आंबा व सेमरीघटही समेत अन्य गांवों के ग्रामीणों पर बीते दो सालों में तेंदुआ हमला कर चुका है।
आंकड़ों की बात करें तो बीते दो साल में 80 लोगों को तेंदुआ जख्मी कर चुका है। इसमें सबसे ज्यादा संख्या बच्चों व युवाओं की है। वहीं, 11 लोगों को तेंदुआ निवाला भी बना चुका है। जंगल से निकलकर किसी न किसी गांव में तेंदुआ पहुंचकर ग्रामीणों पर हमला कर रहा है। इससे ग्रामीणों की जान को हमेशा खतरा बना रहता है। पिछले पांच दिनों के अंदर तेंदुए के हमले में गई तीन मासूमों की जान वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। वन विभाग के लिए वन्य जीवों की सुरक्षा जितनी बड़ी चुनौती है उतना ही चुनौतीपूर्ण मानव के जीवन को सुरक्षित रखना भी है। वन विभाग दोनों चुनौतियों को स्वीकार कर काम कर रहा है।
तेंदुआ व बाघ के हमले में अगर किसी भी ग्रामीण या बच्चे की मौत होती है तो राज्य सरकार के आपदा कोष से एक सप्ताह के अंदर पांच लाख रुपये देने का प्रावधान है। वन्य जीव के हमले में घायल लोगों के मुआवजे के लिए वन विभाग की ओर से पत्राचार किया जाता है। बजट आने पर उन्हें मुआवजा दिया जाता है। विभाग के अनुसार दो साल में हुए हमलों में घायलों को मुआवजा मिल चुका है। हाल के पांच से छह लोग बचे होंगे। उन्हें भी जल्द ही मुआवजा दिलाया जाएगा।
जंगल से सटे गांवों में निवास करने वाले ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उन्हें लगातार जागरूक किया जा रहा है। उन्हें समझाया जा रहा है कि जंगल में या जंगल की ओर कतई न जाएं। बच्चों को अकेला बिल्कुल जंगल की तरफ न भेजें। ग्रामीण जागरूक हो जाएं तो वन्यजीवों के हमलों पर अंकुश लगेगा।
-आकाशदीप बधावन, डीएफओ, कतर्नियाघाट