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कारगिल युद्ध में शहादत देकर लिखी थी विजयगाथा

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बड़ौत। कारगिल में बागपत के बेटों ने लहू से विजयीगाथा लिखी थी। जिले के चार सैनिकों ने देश के लिए बलिदान दिया। सेनानी अमर हो गए और बाकी रह गईं उनकी यादें। उनकी शौर्य गाथा पढ़कर आज भी जिला गौरवान्वित होता है। जवानों की बहादुरी के किस्से सुनकर लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। परिजन लाड़लों को यादकर भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि बलिदान पर गर्व है परंतु लाड़लों की हर पल याद आती है।
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हवलदार मेजर यशवीर सिंह की शाहदत आज भी याद करते हैं
कारगिल की सबसे ऊंची चोटियों में शामिल तोलोलिंग पर सिरसली गांव के यशवीर तोमर ने वीरता की कहानी लिखी थी। दुश्मन को मार भगाने वाले तोमर ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। फतेह के बाद दुश्मन के हमले में वे गंभीर घायल हुए और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। सिरसली गांव के किसान गिरवर सिंह के पुत्र यशवीर तोमर 1979 में सेना में भर्ती हुए थे। पहाड़ी पर फतह कर तिरंगा लहराने वाले यशवीर सिंह उस वक्त ग्रेनेड हमले में घायल हुए थे। जिससे उनकी मौत हो गई।
सबको सुनाई पीड़ा पर नहीं मिली पेंशन
जाट बटालियन में तैनात बावली गांव के अनिल कुमार ने द्रास सेक्टर में आठ जुलाई 1999 को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। शहीद अनिल कुमार की पत्नी सविता देवी के लिए पेंशन की मांग कईं सालों से की जा रही है परंतु सुनवाई नहीं हुई। उन्हें देश के लिए बलिदान देने वाले अपने पति पर उन्हें गर्व है। उनका कहना है कि सरकार को सैनिक परिवारों का ख्याल रखना चाहिए। परिवार में मां संतोष देवी, पत्नी सविता देवी, बेटी प्रिया, बेटे प्रियांशु और हिमांशु हैं।
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जिवाना के जितेंद्र सिंह ने दिया अमर बलिदान
जिवाना गुलियान निवासी शहीद सिपाही जितेंद्र सिंह ने सात जुलाई 1999 को द्रास सेक्टर में युद्ध के दौरान बलिदान दिया। शहीद के भाई बिजेंद्र सोलंकी और मां ब्रहमकौर कहती हैं कि शहीद के माता-पिता को विशेष पेंशन राशि की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार को शहीदों के परिवार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जितेंद्र के शहीद होने के बाद उसकी पत्नी अपने मायके चली गई। सरकार ने जो सहायता दी, उसका लाभ जितेंद्र की पत्नी को हुआ, परिवार को नहीं।
धामा के बलिदान पर गर्व, बेटा बन गया चिकित्सक
बिनौली गांव निवासी हवलदार पदम सिंह धामा का बलिदान अमर है। कारगिल की चोटियों पर सबसे पहले पदम सिंह धामा ने ही बलिदान दिया था। भाई सौराज सिंह बताते हैं कि उन्होंने आठ मई 1999 को बटालिक सेक्टर में शहादत दी थी। दुश्मन घुसपैठ कर चुका था। सबसे पहले मोर्चे पर पदम सिंह और उनकी टुकड़ी को भेजा गया। उन्होंने युद्ध में दुश्मन के दांत खट्टे कर बलिदान दिया। परिवार में माता शकुंतला देवी, भाई सौराज सिंह, पत्नी मुकेश देवी, पुत्र अक्षय धामा और निखिल धामा हैं। निखिल आंख, नाक व गला विशेषज्ञ चिकित्सक हैं।
सरकार ने पूरा नहीं किया जमीन देने का वादा
फोटो नंबर 25केएआर 4,ए
खेकड़ा। कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले खेकड़ा निवासी शहीद राजेंद्र सिंह के परिवार को सरकार ने नौ बीघा जमीन देने का वादा किया था। इसे 22 साल बाद भी पूरा नहीं किया गया है।
कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए राजेंद्र सिंह का शव आठ जुलाई 1999 को मोहल्ला रामपुर स्थित उनके घर पहुंचा। इस दौरान नगर नारों से गूंज उठा था। वहीं, सभी की आंखें नम थीं। तत्कालीन अटल सरकार ने शहीद फंड के अतिरिक्त पेट्रोल पंप, पत्नी व माता-पिता की पेंशन आदि तमाम राहत दीं। तत्कालीन विधायक रूप चौधरी ने पाठशाला रोड पर कारगिल शहीद द्वार का निर्माण कराया था। बड़ागांव रास्ते का नाम शहीद राजेंद्र सिंह मार्ग रखा गया था। ऐसे कठिन समय में शहीद राजेंद्र सिंह के पिता जयसिंह, माता शकुंतला देवी, पत्नी मुनेश व पुत्र हिमांशु ने हिम्मत से काम लिया। शहीद राजेंद्र सिंह के बडे़ भाई सेंसरपाल धामा का कहना है कि सरकार ने नौ बीघा जमीन देने का वादा पूरा नहीं किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार शहीद परिवारों को भूल रही है। कुछ वर्ष पूर्व अज्ञात वाहन ने शहीद द्वार गिरा दिया था। इसका पुनर्निर्माण उन्होंने अपने खर्च से कराया है।
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