बागपत। देव, परिवार, वंश परंपरा, संस्कृति और इष्ट के प्रति श्रद्धा रखना श्राद्ध है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक 16 दिन का समय पितृ पक्ष है। जो परिजन शरीर छोड़ कर चले गए हैं। उनकी आत्मा की शांति के तर्पण के लिए पिंडदान किया जाता है। श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक किया जाता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित राजकुमार शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध में मृत्यु के देवता यमराज जीव को मुक्त कर देते हैं। वह परिवार का तर्पण पिंडदान स्वीकार कर सकें। इस पक्ष में तामसी वस्तुओं से दूर रहें। श्राद्ध का उत्तम समय दोपहर का होता है। नित्य की पूजा अवश्य करनी चाहिए। घर में सुबह-शाम घी का दीपक जलाना चाहिए। जन्म मरण में भी पितृपक्ष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि सभी कार्य पूर्व की भांति किए जाते हैं। श्राद्ध में पितृ देव प्रसन्न होने पर घर सुख शांति के साथ-साथ किसी भी वस्तु का अभाव नहीं रहता है। श्राद्ध में किसी भी जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इस बार पूर्णिमा का श्राद्ध 20 सितंबर को और एकादशी का श्राद्ध दो अक्तूबर को होगा। छह अक्टूबर को पितृ विसर्जनी अमावस्या है। शास्त्रों के अनुसार पितृ विसर्जनी अमावस्या को भूले-बिसरे सभी का श्राद्ध करने का विधान है। पितृ अमावस्या पर गजच्छाया योग अति उत्तम है। इस योग मे पितरों के लिए किया गया कार्य सफल होता है। तर्पण में तिल ,जौ, दूध का प्रयोग करने से पितृ खुश होते हैं और अपनी कृपा बनाए रखते हैं।