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मां ...ऐसी ममता और कहां

Sun, 10 May 2015 12:31 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, औरैया
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बच्चों के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने वाली मां आदिकाल से अनंत तक पूज्यनीय है। कभी यशोदा तो कभी अपने पुत्र के लिए झांसी की रानी बनने वाली मां की गौरव गाथाएं अविस्मरणीय हैं। दुखों को सहकर अपने औलाद के लिए अपना अस्तित्व मिटाने वाली मां के कदमों पर अमर उजाला सजदा करता है।
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मदर्स डे पर गरीबी, अभावों के बावजूद अपनी औलाद को बुलंदी के मुकाम तक पहुुंचाने वाली ममता, त्याग और दया की प्रतिमूर्ति माताओं के संघर्षं की अमर उजाला की खास रिपोर्ट...



हमारे तो यहीं हैं अनमोल रतन - औरैया। छह बहनों और इकलौते भाई छोड़कर सुखमय भविष्य के सपने सजाकर वर्ष 1987 में ससुराल ग्राम करेरा, शिवपुरी (मध्य प्रदेश) गईं शहर के फूलगंज मोहल्ला निवासी नाथूराम महाशय की पुत्री शर्मिष्ठा गुप्ता आज सुकून महसूस कर रही हैं।
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शर्मिष्ठा की किस्मत में कपड़ा व्यवसायी पति राजेश गुप्ता शराबी निकला। ससुराल में शारीरिक, आर्थिक व मानसिक उत्पीड़न की शिकार रहीं। 2001 में घर से निकाली गईं शर्मिष्ठा ने दो बेटियां आकांक्षा सेठ व अनुपम सेठ व बेटा शशिराज सेठ के साथ औरैया में शरण ली। पीहर वालों ने उन्हें अपनाने से इंकार कर दिया।


 
ससुराल व मायके के बंद दरवाजों के चलते अपना व बच्चों का पेट पालना मुश्किल था। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई का बोझ स्नातक उत्तीर्ण शर्मिष्ठा को अंदर बैठ गया। पिता की स्वच्छ छवि का सहारा लेकर तहसील में स्टांप वेंडर का लाइसेंस हासिल कर शर्मिष्ठा ने नये सिरे से जिंदगी की शुरुआत की।



आज उनकी बड़ी बेटी आकांक्षा बीएससी, एमए, बीएड, पीजीडीसीए डिप्लोमा हासिल कर नौकरी के काबिल है। वहीं छोटी बेटी अनुपम सेठ बीए के बाद वकालत की शिक्षा प्राप्त कर रही है। वहीं बेटा शशिराज बीएससी का छात्र है।



यहीं नहीं बड़ी बेटी निजी विद्यालय में शिक्षिका भी है, जबकि ब्लैक बेल्टधारी छोटी बेटी अनुपम जूडो कराटे की प्रशिक्षक है। संघर्ष की काली रात के बाद आज बच्चों की उन्नति पर शर्मिष्ठा सुकून महसूस करते हुए यही कह रही हैं कि मेरे तो यही अनमोल रतन हैं। वहीं उनके बच्चे भी मां के संघर्ष पर बलिहारी हैं।
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