900 वर्ष पहले से ग्राम बैसुंधरा में स्थापित प्रसिद्ध गमा देवी मंदिर आज श्रृद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि जिसने भी मंदिर में आस्था पूर्वक माथा टेका, उसके मन की मुरादें पूरी हो गईं।
किंवदंतियों के अनुसार 900 वर्ष पूर्व सुंदरलाल नामक एक वैश्य का भरा पूरा परिवार था। देवी द्वारा दिए स्वप्न के पश्चात उसने देवी की स्थापना कराई थी। वर्तमान में बैसुंधरा नाम से पूर्व में सुंदरलाल वैश्य के नाम से ही गांव का नाम वैश्य नगर था। धीरे धीरे गांव का नाम वैश्य और सुंदर को जोड़कर वैसुंधरा पड़ गया।
ग्रामीण बताते हैं कि गढ़ी पर गमा देवी स्थापित थी। स्थापना के बाद जिसने भी गढ़ी पर कब्जा करने का प्रयास किया, उसका सर्वनाश हो गया। धीरे धीरे धीरे गमा देवी पर श्रृद्धालुओं की आस्था प्रगाढ़ होती गई। ख्याति आसपास फैली और मंदिर पर श्रृद्धालु उमड़ने लगे। नवरात्र के अवसर पर यहां श्रृद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
मुआवजा से कराया मंदिर निर्माण - बैसुंधरा गांव के बाबा बलवीर सिंह यादव के मन में गमा देवी के प्रति प्रगाढ़ आस्था है। आस्था का परिणाम है कि वर्ष 1995 में उनकी जमीन गेल इंडिया लिमिटेड ने अधिग्रहीत की। बाबा बलवीर दास ने जमीन के अधिग्रहण के बाद प्राप्त धनराशि से मंदिर का निर्माण कराया।
मां की कृपा - पूर्व प्रधान रणवीर सिंह यादव बताते हैं कि वर्ष 2000 से लगातार वह एवं उसके बाद उनकी पत्नी सुषमा गांव की प्रधान हैं। वे गमा देवी की ही भक्ति का इसे परिणाम बताते हैं। उन्होंने 2000 में पहली बार प्रधान बनने के बाद मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। वर्ष में दो बार शरद पूर्णिमा एवं वैशाख कृष्ण तृतीया को मेला लगता है।
अटूट आस्था - गांव निवासी युवा गौरव यादव का कहना है कि युवाओं में मंदिर के प्रति अटूट आस्था है। मंदिर पर मत्था टेककर किसी कार्य को प्रारंभ करने से निश्चित तौर पर सफलता कदम चूमती है। गांव के अधिकतर लोग किसी काम की शुरुआत मंदिर पर मत्था टेकने के बाद ही करते हैं।