औरैया। बीहड़ में यमुना नदी के तट पर स्थित माता कर्ण देवी का ऐतिहासिक मंदिर श्रद्धालुओं के लिए नवरात्र के दिनों में अटूट आस्था और श्रद्धा का अनूठा उदाहरण हैं। भक्तों का मानना है कि माता कर्ण देवी के मंदिर में जो भी भक्त श्रद्धा और भक्ति के भाव से आता हैं। उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यहां की ऐतिहासिक खंडिंत मूर्तियों को देखने के लिए उत्तर भारत के अलावा मध्य भारत से हजारों सैलानी आते हैं।
जिले के कस्बा भीखेपुर से 14 किलो मीटर दूर बीहड़ में यमुना नदी के तट पर बसे खेरे पर माता कर्ण देवी का प्राचीन मंदिर है। इसका निर्माण लगभग दो हजार वर्ष पूर्व हुआ था। मंदिर में वैराग्य स्टेट के राजा कर्ण ने माता भगवती की स्थापना कराई थी। राजा कर्ण के बारे में जानकारों का कहना है कि दानवीर राजा कर्ण माता कर्ण देवी के आशीर्वाद से प्राप्त सवा मन सोना प्रतिदिन दीन-दुखियों व प्रजा को बांटते थे। माता को प्रसन्न करने व उनकी कृपा पाने के लिए राजा कर्ण खोलते तेल में खड़े होकर अपना शरीर मां को समर्पित कर दिया था।
इससे प्रसन्न होकर कर्ण देवी ने उन्हें प्रति दिन सवा मन सोना उपहार स्वरूप देने का आशीर्वाद दिया था। राजा कर्ण सवा मन सोने को प्रतिदिन दान देने की चर्चा फैल गई थी। इस बात को जानने के लिए मध्य प्रदेश स्थित उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने यहां आकर नौकरी की। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने देखा कि राजा कर्ण ब्रह्म मुहूर्त में खोलते तेल में खड़े होकर माता रानी की पूजा करते हैं। तब खुश होकर माता उन्हें सवा मन सोना दान करने का वरदान देतीं हैं। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने राजा कर्ण का वेश धारण करके खोलते तेल में खड़े होकर माता रानी की पूजा शुरू की। माता ने उन्हें पहचान लिया और वर मांगने को कहा।
राजा विक्रमादित्य ने उनसे अपने राज्य उज्जैन चलने का आग्रह किया, मगर माता ने मना कर दिया। इनकार सुनकर क्रोध के वशीभूत होकर राजा विक्रमादित्य ने तलवार के प्रहार से माता की मूर्ति को दो भागों में विभाजित कर दिया। विभाजित मूर्ति के धड़ को उज्जैन में लाकर स्थापित किया। वहां सिद्धि देवी के नाम से आज भी पूजा अर्चना की जाती है। जबकि आधे खंडित भाग को राजा कर्ण ने मंदिर में स्थापित कर दिया। जिन्हें कर्ण देवी के नाम से भक्त पूजते हैं।