मंडी धनौरा। नौ साल की प्रिया और उससे एक साल छोटे भाई एकांत के खेलने-कूदने के दिन हैं। इन दोनों के सबसे बड़े भाई रोहन (12) के कंधे और हाथ भी अभी इतने मजबूत नहीं हैं कि कठिन श्रम या चुनौतीपूर्ण काम का बोझ उठा सकें। इसके बावजूद रोहन काम की तलाश में है। अपने और छोटे भाई-बहन का पेट पालने का दबाव उसे काम की तलाश के लिए मजबूर करता है। मासूम प्रिया भी बचपन की उछल-कूद भूल कर बड़े भाई के साथ काम में हाथ बंटाने की मंशा रखती है। लेकिन बाल श्रम कानून की बंदिश काम की कोशिश को नाकाम कर देती है तो जिंदगी आगे बढ़ाने का कोई और विकल्प भी इन बच्चों को नहीं सूझता है।
फिल्मी कहानी सी महसूस होने वाली यह जिंदगानी है मंडी धनौरा के गांधी नगर मोहल्ले में रहने वाले ऐसे बाल परिवार की, जिसका कोई सरपरस्त नहीं है। तीन बच्चों के इस परिवार के मुखिया रोहन की उम्र महज 12 वर्ष है। रोहन बताता है कि वर्ष 2014 में बीमारी के चलते मां बबिता दम तोड़ गई थीं। पिता नरेश कुमार ने रिक्शा खींचने के साथ परिवार की गाड़ी खींचने में भी ताकत लगाई लेकिन ऐसा लंबे समय नहीं चल सका। कुछ साल बाद नरेश को बीमारी ने ऐसा पकड़ा कि वह फिर उठ नहीं सके। वर्ष 2019 में उनकी भी मौत हो गई।
नरेश के न रहने से पांचवीं तक की पढ़ाई करने वाले बेटे रोहन का स्कूलिंग बरकरार रखने का सपना सपना चूर हो गया। छोटे भाई-बहन का पेट भर पाना तो दूर खुद के खाने के भी लाले पड़ गए।
पड़ोसी राम सिंह बताते हैं कि नरेश के निधन के बाद से तीनों मासूमों का बचपन छिन गया। मासूम होते हुए भी खुद्दारी का अहसास रखने वाला रोहन किसी से मदद मांगने की बजाय सिर्फ काम मांगता है। बाल श्रम पर रोक के नियमों के कारण कोई काम देने को तैयार नहीं होता। पड़ोस के एक-दो परिवार जिद करके और रोहन व उसके भाई-बहन को खाना खिला देते हैं। वे चूक जाएं तो बच्चे भूखे ही रह जाते हैं।
नजदीक रहने वाले परिवारों का मानना है कि अफसरों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संस्थाओं को इन बच्चों की सुरक्षा व परवरिश के लिए आगे आना चाहिए। शिक्षा या उम्र के अनुसार उनकी आय का रास्ता तैयार करना चाहिए। मुफ्त राशन और आवास का लाभ सरकारी योजनाओं से दिलाया जा सकता है। क्लब, सामाजिक संस्थाओं का सहयोग नन्हों को बड़ी खुशियां दे सकता है।
टपकता है शेड तो बरसती हैं आंखें
मंडी धनौरा। रोहन, प्रिया और एकांत के आसपास रहने वाले लोग बताते हैं कि रिक्शा चलाकर घर चलाने वाले नरेश ने जैसे-तैसे रहने के लिए एक कमरा बनवा लिया था। छत के नाम पर उस पर शेड पड़ा है। शेड कमजोर हो जाने से बरसात में पानी भीतर आता है तो छोटे बच्चे परेशान हो जाते हैं। नन्हा रोहन रोने लगता है। पड़ोसियों ने मिलकर शेड ठीक कराया था लेकिन पड़ोस में रहने वाले भी ज्यादा मजबूत आर्थिक स्थिति के नहीं हैं। ऐसे में मजबूत मदद की पहल उनके स्तर से भी नहीं हो पाती। संवाद
बेसहारा बच्चों का राशन कार्ड बनाने के लिए कार्रवाई की जाएगी। सरकार की अन्य योजनाओं का लाभ भी दिलाया जाएगा।
- मांगेराम चौहान, एसडीएम, धनौरा