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Amroha News: अमरोहा में चरागाह और नदी की 2880 बीघा जमीन के कर दिए गए 500 से ज्यादा पट्टे

Tue, 07 Jul 2026 12:53 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
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अनिल चौहान
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अमरोहा। संभल के बाद अमरोहा में भी सरकारी जमीन खुर्दबुर्द किए जाने का बड़ा खेल सामने आया है। मोटी रकम वसूलकर हसनपुर तहसील के चार गांवों की ही करीब 2880 बीघा सरकारी भूमि श्रेणी बदलकर बांट दी गई। इसमें गंगेश्वरी में 1100 बीघा, दढि़याल में 80, रहरा 1200 और आदमपुर में 500 बीघा सरकारी भूमि से पट्टे किए गए थे। पांच सौ से ज्यादा पट्टे किए गए हैं। यह भूमि राजस्व रिकार्ड में चरागाह, झील, तालाब (कुंडा) और नदी के रूप में दर्ज है। नियमों को दरकिनार करके जमीनों की श्रेणी बदली गई और बंजर भूमि दर्शाकर पट्टा आवंटन किया गया। संपत्ति के जानकारों ने आज के बाजार भाव के हिसाब से पट्टों से जुड़ी कुल जमीन की कीमत 1.44 अरब रुपये आंकी है।
मनमानी रकम वसूलकर सरकारी जमीनों का यह बंदरबांट वर्ष 1987 से 2000 के बीच किया गया। हसनपुर तहसील के चार गांव आदमपुर, रहरा, दढ़ियाल और गंगेश्वरी इस खेल के दायरे में रहे। घपले का पता चलते ही आनन फानन दो गांव गंगेश्वरी और दढ़ियाल के 225 पट्टे निरस्त भी कर दिए गए हैं, जबकि आदमपुर व रहरा गांवों के पट्टों के मामले में एडीएम न्यायिक की कोर्ट में सुनवाई चल रही है। आला अफसरों का कहना है कि जिन 13 वर्षों में पट्टे आवंटित हुए हैं, उस समय के तहसील (राजस्व) के कर्मचारियों से लेकर अधिकारी तक जांच की जद में आएंगे। जिम्मेदारी तय करके कार्रवाई का सिलसिला शुरू किया जाएगा।
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जिले में 2024 से चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुई है। चकबंदी का सिलसिला आगे बढ़ने के बीच गांव आदमपुर, रहरा, दढ़ियाल और गंगेश्वरी में सरकारी जमीनों की श्रेणी बदलने की चौंकाने वाली बात सामने आई। यह भी स्पष्ट हुआ कि 500 से अधिक पट्टे करके इस सरकारी जमीन को दूसरों के हवाले किया गया था। इससे राजस्व टीम में हड़कंप मच गया। चकबंदी विभाग से इस आशय की जानकारी मिलने के बाद पट्टा निरस्तीकरण और जांच की प्रक्रिया शुरू की गई। जानकार बताते हैं कि नियमानुसार, चरागाह, नदी, झील, तालाब और अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि कभी निजी इस्तेमाल के लिए आवंटित नहीं की जा सकती। -संवाद

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एडीएम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी...तत्कालीन अधिकारियों की जिम्मेदारी
पट्टों की आड़ में सरकारी जमीन खुर्दबुर्द किए जाने का मामलों की सुनवाई के दौरान ए़डीएम न्यायिक धीरेंद्र प्रताप ने कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यदि सरकारी भूमि का गलत आवंटन हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी केवल पट्टाधारकों की नहीं हो सकती। भूमि की प्रकृति की जानकारी लेखपाल, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार और एसडीएम को होती है। यदि उन्होंने अभिलेखों में बदलाव कर या नियमों की अनदेखी करते हुए भूमि आवंटित की है तो इसकी जवाबदेही भी उन्हीं अधिकारियों पर बनती है। इसलिए केवल पट्टाधारकों को दोषी ठहराना उचित नहीं माना जा सकता।
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कोट-
हसनपुर तहसील के रहरा, आदमपुर, गंगेश्वरी और दढ़ियाल में सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर किए गए पट्टों के निरस्तीकरण की कार्रवाई डीएम के निर्देश पर एडीएम न्यायिक के न्यायालय में विचाराधीन है। जमींदारी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 तथा वर्तमान राजस्व संहिता की धारा 77 (पूर्व धारा 132) के अनुसार चरागाह, तालाब, झील, नदी की भूमि पर किसी व्यक्ति को पट्टा या स्वामित्व का अधिकार नहीं दिया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि ऐसी भूमि को उसके मूल स्वरूप में बहाल किया जाए। इन्हीं कानूनी प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप न्यायालय में कार्रवाई की जा रही है।
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- राजेश कुमार राणा, जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व), अमरोहा
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ये पट्टे काफी पुराने हैं। उस समय किस स्तर पर और क्यों चारागाह, झील, तालाब और नदी जैसी सार्वजनिक उपयोग की भूमि को अभिलेखों में बंजर दर्शाकर उसका आवंटन कर दिया गया, जबकि कानून के अनुसार ऐसी भूमि का पट्टा किसी व्यक्ति के नाम नहीं किया जा सकता। अब तक दो गांवों के पट्टे निरस्त कर संबंधित भूमि को फिर से चरागाह एवं अन्य मूल श्रेणियों में दर्ज कराया जा चुका है। शेष दो गावों के मामलों की सुनवाई न्यायालय में चल रही है। जिले में सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर गलत तरीके से किए गए सभी पट्टों को निरस्त किया जाएगा। -धीरेंद्र प्रताप, एडीएम न्यायिक, अमरोहा
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