गौरीगंज/मुसाफिरखाना (अमेठी)। जिले का ऐतिहासिक कादूनाला 1,857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का गवाह रहा है। इस वन क्षेत्र में चुनिंदा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नेतृत्व में निकली युवाओं की फौज ने संसाधनों से लैस अंग्रेजी हुकूमत को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। इस युद्ध में क्षेत्र व आसपास के 600 से अधिक युवा भाले सुल्तानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
ऐतिहासिक कादूनाला मुसाफिरखाना तहसील मुख्यालय से पांच किलोमीटर पश्चिम लखनऊ-वाराणसी हाइवे के नीचे से होकर बहता है। नाला और इसके किनारे का 392 हेक्टेयर भू-भाग वन क्षेत्र से आच्छादित है। इस नाले व वन क्षेत्र की महत्ता इस बात को लेकर है कि यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का गवाह रहा है।
इतिहास में दर्ज तथ्यों के अनुसार जनरल फ्रैक्स की अगुवाई में फौज बढ़ रही थी। सुल्तानपुर के चांदा तक उनका कब्जा हो गया था। अमेठी की पावन धरती को गुलामी की जंजीरों से बचाने के लिए भाले सुल्तानी दृढ़ थे। जीत का गुमान लेकर कादूनाला के पास पहुंचे जनरल फ्रैक्स को आभास भी नहीं था कि यहां उसके ऊपर तोपें बरसने लगेंगी।
सात व आठ मार्च को हुई लड़ाई में रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना को पस्त कर दिया। हालांकि दूसरे दिन दो गद्दारों ने जनरल फ्रैक्स को कादूनाला पार करने का दक्षिणी मार्ग बता दिया। नौ मार्च की सुबह जिले के रणबांकुरे पीछे से घेर लिए गए।
कुछ गद्दारों ने पिसी मिर्च मिलाकर फायर किया। इससे वीर सैनिक नाले में गिर गए। कुछ सैनिकों को लेकर सेनानायक बाबू महमद हसन खां निकल लिए। सैकड़ों वीर देश पर बलिदान हो गए। कादूनाला पर वीर शहीदों का सिर सजाया गया।
सुल्तानपुर के कांपा निवासी रघुबीर सिंह का सिर अंग्रेजों ने सबसे ऊपर रखा। बड़ी संख्या में शहद हुए भाले सुल्तानियों का सिर काटकर अंग्रेजों ने पास के एक कुएं में डाल दिया था। कादूनाला की लड़ाई तो अंग्रेजों ने नौ मार्च को जीत ली लेकिन क्षेत्र पर उनका अधिकार 28 अक्टूबर को हो पाया।
इस युद्ध में बंदी बनाए गए अधिकांश वीरों को बाद में टीकाराम के बाग में फांसी दी गई। जगदीशपुर के व्यापारी भैरव प्रसाद लाला को अंग्रेजों ने जौनपुर में फांसी दी। बताते हैं कि इस युद्ध में क्षेत्र के 600 से अधिक भाले सुल्तानी शहीद हो गए। देश की बलिवेदी पर किसी ने अपने बेटे की कुर्बानी दी तो किसी ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
इनका भी रहा था प्रमुख योगदान
1857 में सात, आठ व नौ मार्च को कादूनाला पर हुए इस युद्ध में बैसवारा के राजा राणा वेनी माधव, महोना के राजा अहमद हसन खां, भाले सुल्तान क्षत्रिय में हलियापुर के अंगद सिंह, कांपा के रघुबीर सिंह, उमरा के हरिदत्त सिंह, जादोराय के माधव सिंह, कोछित के हिमांचल सिंह आदि का प्रमुख योगदान था। इस युद्ध में 600 से अधिक भाले सुल्तानियों ने अंग्रेजों से मोर्चा लेते हुए शहादत प्राप्त की थी।
नौ मार्च को दी जाती है श्रद्धांजलि
अंग्रेजों से लोहा लेते हुए कादूनाला के पानी को खून से लाल कर देने वाले वीर शहीदों की शहादत पर प्रत्येक वर्ष नौ मार्च को श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जुटने वाले क्षेत्र के लोग शहीदों की आत्मा की शांति के लिए हवन-पूजन करते हैं।