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धनु के पंद्रह, मकर पच्चीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस

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सिंहपुर (अमेठी)। महाकवि घाघ की एक मशहूर कहावत है ‘धनु के पंद्रह, मकर पच्चीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस’। अर्थात धनु राशि के पंद्रह दिन और मकर राशि के पच्चीस दिन अर्थात दोनों को मिलाकर चालीस दिन का समय ऐसा होता है, जब भयंकर जाड़ा पड़ता है। उनकी यह कहावत आज भी प्रासंगिक है। धनु संक्रांति यानी सूर्य का धनु राशि में प्रवेश बीते दिनों 16 दिसंबर को हो चुका है। साथ ही खरमास भी इस दिन से शुरू हो गया। अब 14 जनवरी 2022 दोपहर 2:29 बजे तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे।
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शिव बहादुर सिंह संस्कृत महाविद्यालय के आचार्य दिनेश चंद्र शुक्ल बताते हैं कि जब भी पक्ष, राशि, अयन या ऋतु आदि बदलती हैं, वह संक्रांति ही है। पर सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश करने वाली संक्रांति का विशेष महत्व है, जिसे मकर संक्रांति कहते हैं। भारत में कालगणना मुख्यतया चंद्रमा की गति के आधार पर होती है। अंग्रेजी कालगणना का आधार सूर्य ही है।
मकर संक्रांति सूर्योपासना का पर्व है। इसलिए इसकी अंग्रेजी तिथि भी प्राय: 14 जनवरी रहती है। वैसे प्रति 50 वर्ष में एक दिन का अंतर इसमें भी आ जाता है। 12 जनवरी, 1863 को विवेकानंद के जन्म के समय मकर संक्रांति ही थी। इस दिन से सूर्य का प्रकाश तीव्र एवं दिन बड़ा होने लगता है। यद्यपि शीत का प्रकोप इसके बाद भी बना रहता है। ‘धनु के पंद्रह, मकर पचीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस’ वाली कहावत इसी ओर संकेत करती है।
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मकर संक्रांति से 15 दिन पूर्व और 25 दिन बाद तक चिल्ला जाड़ा माना जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार ईसा मसीह का जन्म भी इसी दिन हुआ था। पर जब पोप ग्रेगरी ने अंग्रेजी कैलेंडर बनाया, तो इसे बीस दिन पीछे ले जाकर 25 दिसंबर को घोषित कर दिया और फिर उसी को बड़ा दिन कहने लगे। मकर संक्रांति के साथ कुछ ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी हैं। पहली घटना महाभारत युद्ध से संबंधित है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। वे दक्षिणायन के बदले उत्तरायण में शरीर छोड़ना चाहते थे। मकर संक्रांति पर जब सूर्य मकर राशि में आकर उत्तरायण हुए, तब उन्होंने देहत्याग किया। इतने दिन तक वे गंगा तट पर शर शैया पर ही लेटे रहे।
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