नाथ संप्रदाय से जुड़े गोरक्ष पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ द्वारा सूबे की कमान संभालने के साथ ही नाथ संप्रदाय बहुत तेजी से सुर्खियों में है। लोगों में नाथ संप्रदाय के बारे में अधिक से अधिक जानने-समझने की उत्सुकता बढ़ी है। इसे साबित कर रही है डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखित और हिन्दुस्तानी एकेडेमी से प्रकाशित पुस्तक ‘नाथ संप्रदाय’, जिसकी बिक्री दस से बारह गुना तक बढ़ गई है।
नाथ संप्रदाय की इस एकमात्र प्रामाणिक पुस्तक का प्रथम संस्करण वर्ष 1950 में प्रकाशित हुआ था। पहले संस्करण की प्रतियां खत्म होने के बाद लंबे समय से यह पुस्तक अप्राप्य थी। ऐसे में एकेडेमी ने वर्ष 2012 में इसे पुनर्प्रकाशित किया। हालांकि गौरतलब है कि बीते पांच वर्षो के दौरान जहां इसकी पांच-दस प्रतियां ही बिकी थीं, योगी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही माह भर के भीतर ही इसकी तकरीबन डेढ़ सौ से ज्यादा प्रतियां बिकी हैं।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह कहते हैं, योगी जी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही लोगों में ‘नाथ संप्रदाय’ के प्रति अधिक से अधिक जानने की उत्सुकता बढ़ी है। खास यह कि इन जिज्ञासुओं में विद्यार्थी, शोधार्थी तो हैं ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों सहित देश के अनेक विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों की ओर से भी इसकी प्रतियां खरीदी गई हैं। किसी पुस्तक के बारे में ऐसी रुचि और रुझान सुखद है। इसे देखते हुए एकेडेमी इसका तीसरा संस्करण भी प्रकाशित करने की तैयारी में है।
भारतीय धर्मसाधना के इतिहास में नाथ संप्रदाय, बहुत महत्वपूर्ण रहा है। हिन्दी में सबसे पहले डॉ.पीतांबर दत्त बर्थवाल ने मागधी अपभ्रंश में सिद्ध साहित्य के महत्व को रेखांकित किया। फिर राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध साहित्य संबंधी प्रचुर सामग्री प्रस्तुत की। इसके बाद 1950 में पहली बार क्रमबद्ध तरीके से डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘नाथ संप्रदाय’ पुस्तक लिखी। इसके आठ से बारह अध्याय के बीच गुरु गोरखनाथ और उनके योग मार्ग के सिद्धांत हैं। अध्याय 12-13 में उनके समसामयिक सिद्धों और परवर्ती सिद्ध संप्रदायों का वर्णन है। अंतिम के दो अध्याय में लोकभाषा में संप्रदाय के नैतिक उपदेशों का सार-उपसंहार है।