केस एक-
शांतिपुरम निवासी 22 वर्षीय एक युवक को भगंदर की शिकायत थी। वह दो साल से परेशान थे। दो बार लीच थेरेपी का उपयोग होने से उन्हें आराम मिल गया।
केस दो-
53 वर्षीय शंकरगढ़ निवासी वैरिकोज वेन्स बीमारी से ग्रसित थे। इससे उनके बाएं पैर का ऑपरेशन हुआ। बाद में बाएं पैर को काटना पड़ गया। दूसरे पैर में भी समस्या बढ़ने पर उनकी दो बार लीच थेरेपी की गई। अब उन्हें पूरी तरह से आराम है।
केस तीन-
कौशाम्बी के रहने वाले 59 वर्षीय मरीज को घुटने में सूजन की शिकायत थी। लीच थेरेपी से उनका अशुद्ध रक्त निकाल दिया गया। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
केस चार-
खुल्दाबाद निवासी 60 वर्षीय एक मरीज को पैर में खुजली की शिकायत थी। इससे उनका पैर काला पड़ गया था। एक बार लीच थेरेपी करने से उन्हें काफी हद तक आराम मिला है।
जोंक के प्रकार
जोंक दो प्रकार की होती है। पहली सविष जलौका, जिसे चिकित्सा में प्रयोग नहीं किया जाता है। दूसरी निर्विष जलौका होती है। इसे चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। केरल, कर्नाटक, वाराणसी, लखनऊ, नागपुर व कोलकाता से यह जोंक मंगाई जाती है। यहां पर इनके ब्रीडिंग ग्राउंड होते हैं। जहां पर इन्हें पकड़ा जाता है। एक बार इस्तेमाल होने पर जोंक को सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया जाता है।
चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली जाेंक को जार में रखा जाता है। जार का पानी प्रतिदिन बदला जाता है। इसके इलाज से लोगों को काफी लाभ मिलता है। मगर इस पद्धति का उपयोग करने से पहले मरीज की सभी जांचे कराई जाती हैं। - डॉ. एसके राय, आयुर्वेदाचार्य, छावनी सामान्य अस्पताल