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प्रयागराज : संगमनगरी के क्रांतिवीरों ने खून से लिखी थी आजादी की गाथा

Sun, 15 Aug 2021 01:12 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

  • सब्जीमंडी के अब्दुल मजीद को गोली लगने के बाद द्वारिका प्रसाद ने थाम लिया था तिरंगा
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prayagraj news : स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आजाद पार्क में फेंस पेंटिंग कर खुशी कर इजहार करती इविवि दृश्य कला विभाग छात्राएं। - फोटो : prayagraj
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विस्तार
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देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए संगमनगरी के किशोर क्रांतिकारियों के बलिदान को इतिहास के पन्नों में भले जगह नहीं मिल पाई हो, लेकिन उनके योगदान को अमर शहीदों से कम नहीं आंका जा सकता। प्रयागराज की सड़कों पर बर्बरता के विरोध में अंग्रेजों की गोली खाकर वंदे मातरम और भारत माता के जयकारे लगाते हुए अंतिम सांस लेने वाले अब्दुल मजीद और द्वारिका प्रसाद जैसे कई क्रांतिकारियों के बारे में लोग जानते तक नहीं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आज हम ऐसे ही कुछ बलिदानियों की शौर्यगाथा बता रहे हैं, जो स्वतंत्रता की लड़ाई में हाथों में तिरंगा लेकर हंसते-हंसते ब्रितानी हुकूमत की गोली खाकर शहीद हो गए थे।

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चार जनवरी 1932 को महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद इलाहाबाद में पूर्ण हड़ताल घोषित कर दी गई। गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस की ओर से जुलूस निकालने की रणनीति बनाई गई। शहर में अंग्रेजी राज विरोधी जुलूसों, सभाओं और नारों का सिलसिला तेज हो गया। उन दिनों जानसनगंज के दरवेश्वरनाथ मंदिर से निकाले गए जुलूस पर घोड़े दौड़ाने की घटना के बाद विरोध की ज्वाला और धधकने लगी। पुलिस का दमनचक्र क्रांतिकारियों के मनोबल और जोश को नहीं कम कर सका। रविचंद्र गुप्ता की पुस्तक शहीद बच्चों की गौरव गाथा में उन दिनों भारत माता की आजादी के लिए हंसते-हंसते सीने पर गोली खाने वाले किशोर क्रांतिकारियों के बलिदान का उल्लेख किया गया है।

रविचंद्र लिखते हैं कि 13 अगस्त 1942 को इलाहाबाद के प्रसिद्ध वैद्य भानुदत्त के 13 वर्षीय पुत्र सीएवी इंटर कॉलेज के छात्र रमेश दत्त मालवीय को न्यायालय पर तिरंगा फहराने के प्रयास में पुलिस ने गोली से उड़ा दिया। इस घटना के बाद पूरा शहर खौल उठा। इस गोलीकांड के विरोध में चौक से विशाल जुलूस निकाला गया। खुल्दाबाद सब्जी मंडी निवासी 15 वर्षीय छात्र अब्दुल मजीद ने जुलूस का नेतृत्व संभाला। इस जुलूस में छात्रों के अलावा शहर के कुछ युवा भी लोग शामिल होते गए।
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पुलिस को जब गोलीकांड के विरोध में जुलूस निकलने की सूचना मिली तो जगह-जगह रास्तों को रोक लिया गया। कोतवाली के पास से नारेबाजी करते हुए बढ़ रहे जुलूस में शामिल छात्रों को पुलिस ने चेतावनी दी कि तुरंत यहां से भाग जाओ, वरना गोलियों से भून दिए जाओगे। पुलिस ने जुलूस को रोक लिया, लेकिन सबसे आगे तिरंगा लेकर चल रहे किशोर क्रांतिकारी मजीद ने पुलिस को ललकारते हुए कहा कि इस बर्बरता की मुखालफत करने से हमें कोई नहीं रोक सकता। मौत भी नहीं। पुलिस ने जुलूस का रास्ता रोक लिया। इसके बाद उसी जगह जुलूस सभा में तब्दील हो गया। शाहगंज मुहल्ला स्थित झा एंड कंपनी में दवाओं के विक्रेता मुरारी मोहन भट्टाचार्य भी इस सभा में शामिल थे।

उन्होंने सभा में पुलिस के अत्याचार के विरोध में शहर के लोगों से खड़ा होने की अपील शुरू कर की। उनका कहना था कि एक-एक कर छात्रों, युवाओं को गोली का निशाना बनाया जा रहा है, आखिर कबतक इस निर्ममता को सहते रहोगे। अब्दुल मजीद से चुप नहीं रहा गया। वह जोश में अंग्रेजी सरकार के विरोध में नारे लगाने लगे। पीछे से भारत माता की जय... महात्मा गांधी जिंदाबाद... वंदे मातरम... के नारे लगाए जाने लगे। तभी पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। दनादन गोलियां बरसने से सभा में कोहराम मच गया। गोलियां चलती रहीं, क्रांतिकारी घायल होकर जमीन पर गिरते रहे। अब्दुल मजीद को गोली लग गई, लेकिन उनके हाथों में तिरंगा लहरा रहा था।

गोली लगने के बाद उन्होंने तिरंगा ऊंचा उठाते हुए एक गीत की पंक्तियां पूरे जोश के साथ दोहराईं- इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए...। इसके बाद एक के बाद एक कई गोलियों से वीर अब्दुल मजीद का शरीर छलनी हो गया। बड़ी बात यह ती कि मजीद की सांसें थमने से पहले ही, उनके हाथ से तिरंगा दूसरे क्रांतिकारी किशोर द्वारिका प्रसाद ने थाम लिया था। हाथ में तिरंगा लिए द्वारिका भी वंदेमातरम का जयघोष करने लगे। लेकिन, कुछ देर बाद ही अंगेजी सैनिक की बंदूक की गोली उनके सीने को भी पार कर गई। द्वारिक भी सीने पर गोली खाकर शहीद हो गए। इनके अलावा झा एंड कंपनी के मुरारी मोहन भट्टाचार्य, भगवती प्रसाद के अलावा कई युवाओं ने भारत माता के जयकारे लगाते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। सैकड़ों घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया।

दारागंज के मठ में भजनानंदी बनकर क्रांतिकारियों ने दिया था पुलिस को चकमा

अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शहर का दारागंज इलाका क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा है। वहां के मठों में साधु वेश में क्रांतिकारी शरण लेते थे। एक मठ में छापाखाना होने की मुखबिरी के बाद जब पुलिस तलाशी लेने पहुंची, तब भजनानंदियों की टोली देखकर खाली हाथ लौट गई, लेकिन दूसरे दिन पूरे शहर में दीवारों पर इश्तहार चस्पा हो गए थे।

1942 के अगस्त महीने में साधुओं के एक मठ पर पुलिस का छापा पड़ने की घटना का जिक्र क्रांति की मशाल और बंदूकें नामक पुस्तक में आया है। इस मठ में रात 11 बजे साइक्लोस्टाइल मशीन से क्रांतिकारियों के संदेश वाले पोस्टर और पर्चे छापने का काम चल रहा था। तभी किसी ने इसी मुखबिरी कर दी। इस पुस्तक में कहा गया है कि रात को अचानक एक पीला वस्त्रधारी साधु दौड़ता हुआ आया और उसने वहां मौजूद लोगों को बताया कि सावधान हो जाओ, पुलिस मठ का पता पूछती घूम रही है।

यह सब बंद करो और यहां से जल्दी भागो। वहां मौजूद क्रांतिकारियों ने छपी सामग्री का बंडल बनाया और तुरंत वहां से निकल गए। शहर के क्रांतिकारियों पर शोध व अध्ययन करने वाले डॉ. सुधांशु मालवीय के मुताबिक उस रात छपी हुई सामग्री हटाए जाने के बाद साइक्लोस्टाइल मशीन को हटाना सबसे बड़ी समस्या थी। मशीन इतनी भारी थी कि उसे तुरंत हटाना संभव नहीं था। लेकिन, एक दाढ़ी वाले महंत ने तत्काल संदूक से रेशमी कपड़ा निकाला और उसी से मशीन ढंक दी। उसके ऊपर भगवान राम और हनुमान की तस्वीरें रख दी गईं।

उन पर मालाएं और फूल बिखेर दिए गए। वहां धूप बत्ती जलाकर क्रांतिकारी साधु मंडली के वेश में झांझ-मंजीरा बजाकर कीर्तन करने लगे। तब तक पुलिस आ गई। पुलिस ने जब मठ के भीतर प्रवेश किया तो वहां आस्था में लीन लोगों को कीर्तन करते देखा। भजनानंदियों को कीर्तन में लीन देख पुलिस ने उनको टोकना उचित नहीं समझा। पुलिस ने तलाशी के लिए मठ का एक चक्कर भी लगाया और फिर चली गई। लेकिन, दूसरे दिन शहर की दीवारों पर पोस्टर लगे मिले। उन पोस्टरों पर लिखा था-गांधी जी का पता नहीं हैै, पं. नेहरू घायल हैं। जेलों में रोज लाठियां बरसाई जाती हैं। आजादी की यह लड़ाई रुकने न पाए। यह आखिरी लड़ाई है, अंग्रेजों के पाव उखड़ गए हैं। उन पोस्टरों को पढ़ने के लिए दूध, सब्जी लेने निकले लोगों की भीड़ लग गई। पुलिस ने दीवारों के पास जब भीड़ देखी, तब उन्हें पीटना शुरू कर दिया। इस घटना में पोस्टर छापने वाले तो पुलिस के हाथ नहीं लगे, लेकिन पढ़ने वाले सैकड़ों लोगों को पुलिस ने जेल में डाल दिया था।

नैनी सेंट्रल जेल बन गई थी क्रांतिकारियों का घर

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंडमान के बाद नैनी सेंट्रल जेल क्रांतिकारियों को कैद करने का दूसरी सबसे बड़ी जेल रही है। इस जेल में काकोरी कांड के कई क्रांतिकारियों को रखा गया था। इसके परिसर में स्थित शहीद स्मारक उन रणबांकुरों की स्मृतियों का अब गवाह बन गया है। इस स्मारक में जंगे आजादी के दीवानों के नाम दर्ज हैं।

आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजी हुकूमत की यातना झेलते इस जेल में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने सजा काटी। जंगे आजादी के दीवानों के लिए नैनी सेंट्रल जेल दूसरे घर जैसी रही है। यहां की दीवारें और बैरकें आज भी क्रांतिकारियों की शौर्यगाथा को बयां क़रती हैं। जेल के अंदर आजादी की लड़ाई से जुड़े कोई दस्तावेज तो संरक्षित नहीं है, लेकिन परिसर में बने शहीद स्मारक में आजादी के 900 से अधिक रणबांकुरों के नाम दर्ज हैं, जिन्हें पढ़ा जा सकता है।

पं. नेहरू और महामना मदन मोहन मालवीय के अलावा इस सेंट्रल जेल में केशव मालवीय, कैलाश नाथ काटजू, विजय लक्ष्मी पंडित, देवदास गांधी, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, अब्दुल कलाम आजाद, इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी, हेमवती नंदन बहुगुणा, सालिग राम जायसवाल, डॉ ताराचंद्र जैन, कल्पनाथ राय, गोविंद देव मालवीय, चंद्रभान गुप्ता के नाम शहीद स्मारक में दर्ज हैं। वरिष्ठ जेल अधीक्षक पीएन पांडेय बताते हैं कि यह जेल क्रांतिकारियों के लिए घर जैसी थी। यहां देश भर के क्रांतिकारियों को रखा जाता था।

जेल में नेहरू का चरखा और कपड़े संरक्षित
नैनी सेंट्रल जेल की बैरक छह में पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने आजादी की लड़ाई में तीन बार यहां पर सजा काटी है। इस भवन को जेल प्रशासन ने नेहरू भवन के नाम से संरक्षित कर रखा है। इसमें बंदियों को नहीं रखा जाता है। यहां पर नेहरू की किताबें, मेज, चरखा, कपड़े, बर्तन, तख्त, कुर्सी सुरक्षित रखी हुई हैं। इस परिसर की दीवारों पर पं. नेहरू की उकेरी गई सात आकृतियों को भी देखा जा सकता है। जेल प्रशासन के अनुसार पं. नेहरू 14 अप्रैल 1930 को यहां पहली बार आए थे। इसके बाद वह 29 सितंबर 1930 और चार जनवरी 1932 को उन्हें इस जेल में डाला गया।

मालवीय सदन में अब कैद होते हैं माननीय
नैनी सेंट्रल जेल की जिस बैरक में पं. मदन मोहन मालवीय थे, उसमें अब माननीयों को कैद कर रखा जाता है। इस बैरक में सामान्य कैदी नहीं रखे जाते। बैरक का नामकरण मालवीय सदन के नाम से है। यह एक बड़ा हॉल है, जिसके अंदर कई बैरकें बनी हुई हैं। छोटे से दरवाजे से इसमें प्रवेश किया जाता है। मालवीय सेंट्रल जेल नैनी में 13 सितंबर 1930 से 23 दिसंबर 1939 तक बंद रहे।

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