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जंगे आजादी : जीटी रोड किनारे ‘फांसी इमली’ सुना रहा है कुर्बानियों की कहानी

Thu, 05 Aug 2021 10:35 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

  • ‘भारत माता’ की प्रतिमा स्थापित कर बनाया गया शहीद स्मारक लेकिन अब तक उपेक्षित
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prayagraj news : प्रयागराज में फांसी इमली। - फोटो : prayagraj
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विस्तार
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जीटी रोड पर चौफटका से सुलेमसराय की ओर बमुश्किल पांच सौ मीटर आगे बढ़ने पर दक्षिणी पटरी पर सीना ताने खड़ा इमली का पेड़ सिर्फ एक छायादार और फलदार पेड़ ही नहीं है, अपने में शहादत का साक्षी और मुकम्मल इतिहास है। कुर्बानियों की कहानी सुनाते इस पेड़ को ‘फांसी इमली’ के नाम से जाना जाता है। यहां 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के कई शहीदों की कहानियां दफन है। इसकी टहनियां अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों की चश्मदीद गवाह हैं।
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दरअसल सन् 1857 में बड़ी संख्या में कौशाम्बी की ओर से पकड़ कर लाए गए क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ से ही लटकाकर फांसी दे गई थी। अंग्रेजों ने सबक सिखाने और दहशत फैलाने के लिए मुख्य मार्ग के किनारे लगे इमली के पेड़ को चुना। क्रूरता ऐसी थी कि इस पर क्रांतिकारियों को फांसी देने के बाद उनकी लाशें कई दिनों तक पेड़ पर ही लटकाए रखी गईं। हालांकि कई बरस पहले जब मूल पेड़ सूखने लगा तो आजादी के जज्बे और जुनून के साथ सुलेमसराय में रहने वाले एडवोकेट राम सिंह ने इसकी जड़ों की मिट्टी में ही एक और इमली का पेड़ लगा दिया, जिसने शहादत की कहानी को संजोते हुए उसे ताजा कर दिया।

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले/वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा’, पर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अब शहीदों के लिए ‘बाकी निशां’ के मायने बदलते जा रहे हैं। उनकी चिताओं पर मेले लगना तो दूर, शहीद स्मारक भी उपेक्षित हैं। राष्ट्रप्रेम के जुनून में वकालत के पेशे से जुड़े रामजी सिंह और उनके कई साथियों ने बगैर सरकारी मदद ‘फांसी इमली’ के पास शहीद स्मारक  बनाकर इस ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट कराया। राम सिंह और साथियों ने श्रमदान करते हुए यहां स्वयं भारत माता की प्रतिमा बनाई और उसे स्थापित कर दिया।
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स्मारक समिति के संयोजक अधिवक्ता राम सिंह कहते हैं, अनुरोध करने पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के पहले नगर निगम की ओर से साफ-सफाई करा दी जाती है लेकिन डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से लेकर नगर निगम और स्थानीय प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने के बावजूद फांसी इमली स्मारक को यथोचित स्वरूप नहीं दिया जा सका है। शहीदों को याद करने के क्रम में यह पहल भले ही नगण्य हो लेकिन, आजादी के मूल्यों को संजोने में यह कोशिश मील के पत्थर से कम नहीं।

प्यारे मोहन को मिली थी ‘फाइटिंग मुंसिफ’ की उपाधि
अंतर्वेद में बड़ी सड़क के किनारे के जमींदार और परगना अथरबन में डिढ़ावल के जमींदार ने 1857 की क्रांति में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। तब मंझनपुर में मुंसिफी थी। बाबू प्यारे मोहन बनर्जी वहां के मुंसिफ हुआ करते थे। क्रांति की ज्वाला भड़कने के बाद प्यारे मोहन बनर्जी ने भी क्रांतिकारियों का दमन करने में पूरी ताकत झोंक दी। पकड़े गए क्रांतिकारियों को प्राणदंड दिया गया। उनकी गिरफ्तारी कराने के कारण ही अंग्रेजों ने उन्हें ‘फाइटिंग मुंसिफ’ की उपाधि दी थी।
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