कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग हर कोई कर रहा है। लिखने, अनुवाद करने, जानकारी जुटाने, तस्वीरें बनाने, डेटा समझने जैसे कई कामों में लोग बड़े पैमाने पर एआई टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन, एआई पर जितनी अधिक और बिना जांच के निर्भरता बढ़ेगी, गलत सूचनाओं और मनगढ़ंत दावों का खतरा भी उतना ही गंभीर होता जाएगा।
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) के डीप लर्निंग प्रयोगशाला के प्रोफेसर वृजेंद्र सिंह ने अमर उजाला में हुई कार्यशाला में इस विषय पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एआई टूल्स कई बार बेहद आत्मविश्वास के साथ गलत तथ्य, फर्जी तारीखें और झूठे संदर्भ तैयार कर देते हैं। तकनीकी भाषा में इसे ‘हैल्युसिनेशन’ कहा जाता है। अगर लोग बिना जांच-पड़ताल के एआई की जानकारी पर भरोसा करने लगें तो समाज में भ्रम और गलतफहमियां तेजी से फैल सकती हैं।
असली-नकली के बीच भ्रम
उन्होंने यह भी बताया कि डीपफेक वीडियो, नकली ऑडियो और एआई से तैयार तस्वीरों के बढ़ते इस्तेमाल ने असली और नकली के बीच का फर्क कम कर दिया है। आने वाले समय में यह चुनौती और गंभीर हो सकती है। इसके अलावा, एआई के अत्यधिक उपयोग से पक्षपात और प्लेजियरिज्म जैसी समस्याएं भी तेजी से सामने आ रही हैं। उन्होंने सलाह दी कि एआई को केवल एक सहायक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि अंतिम सत्य मान लिया जाए। किसी भी जानकारी को साझा करने या उपयोग करने से पहले उसकी सही तरीके से जांच करना बेहद जरूरी है।