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अतीत के पन्नों से : खुसरो बाग में खाली मकबरे को बनाया गया था जहांगीर का आवास

Sat, 28 Aug 2021 05:40 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद के किले में उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों का आवास था, इसलिए जहांगीर को रखने की समस्या आई। कंपनी के अफसरों ने तय किया कि उसे खुसरोबाग में रखा जाए। परिसर में कोई अतिरिक्त इमारत नहीं थी।
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Prayagraj News : शहजादा मिर्जा जहांगीर। - फोटो : प्रयागराज
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विस्तार
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इलाहाबाद के किले में उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों का आवास था, इसलिए जहांगीर को रखने की समस्या आई। कंपनी के अफसरों ने तय किया कि उसे खुसरोबाग में रखा जाए। परिसर में कोई अतिरिक्त इमारत नहीं थी। परिसर में स्थित एक चौथे मकबरे जिसमें कब्र नहीं है, में रहने का इंतजाम किया गया।  इतिहासकार बताते हैं कि यह मकबरा किसी तमोलन बीबी के लिए बनवाया गया था। उसे इसमें दफन नहीं किया गया। यह भी कहा जाता है  कि इसमें फतेहपुर सीकरी की किसी इस्ताम्बुल बीबी को दफन किया जाना था। फिर कहां उसे दफन किया गया, इसका उल्लेख नहीं मिलता। मिर्जा जहांगीर के लिए इसके अलावा टिन और टेंट के अस्थायी निर्माण कराए गए।
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स्थानीय लोगों से घुल-मिल गया था शहजादा
शहजादा खुसरोबाग में अंग्रेज सैनिकों के पहरे में जरूर था इसके बावजूद वह जब चाहता तो सैनिकों के घेरे के बीच शहर में कहीं भी आ-जा सकता था। यहां उससे मिलने शहर के प्रमुख लोग आने लगे। कभी-कभी देर रात कर महफिल भी लगी रहती थी। लोग उसे अपने घरों में आने की दावत देते थे। उधर, दिल्ली में जहांगीर की मां मुमताज महल उसे वापस दिल्ली लाने के लिए कंपनी के अफसरों पर लगातार दबाव बना रही थी।

उसने मेहरौली स्थित ख्वाजा बख्तिायर काकी की दरगाह पर बेटे की वापसी के लिए जियारत की। साथ ही कुछ दूर स्थित योगमाया मंदिर में भी मन्नत मांगी। कुछ दिनों बाद जहांगीर को अफसरों ने वापस दिल्ली भेज दिया। मन्नत पूरी होने पर बेगम मुमताज ने दरगाह पर चादर और मंदिर में हाथ का बना विशाल पंखा चढ़ाया। इस अवसर पर मेहरौली में हर साल सात दिन तक उत्सव मनाया जाने लगा। 1857 गदर के बाद यह उत्सव बंद हो गया। देश की आजादी के बाद यह फिर शुरू हुआ और इसे फूलवालों की सैर नाम दिया गया। यह मेला सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बना।
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Prayagraj News : खुसरो बाग। - फोटो : प्रयागराज
दिल्ली लौटते ही हुआ उद्दण्डी

मिर्जा जहांगीर दिल्ली लौट गया। अपने भाई सिराजुद्दीन के प्रति उसकी नफरत बढ़ गई थी। वह जानता था कि सिराजुद्दीन को रास्ते से हटाए बगैर वह दिल्ली का बादशाह नहीं बन सकेगा। उसने दो बार खाने में जहर देकर भाई तो मारने की कोशिश की। वह उद्दण्ड प्रवृत्ति का हो गया था। अपने पिता और मां की भी बात नहीं मानता था। सेटन के प्रति उसका गुस्सा अब और ज्यादा था। बादशाह अकबर उसे अब दिल्ली में नहीं बने रहने देना चाहता था। सेटन ने उसके कहने पर उसे फिर खुसरोबाग भेज दिया। इस बार भी मिर्जा ने पहले की तरह स्थानीय लोगों से मेलजोल बनाए रखा। उसे बादशाह पिता और मां का समर्थन मिलता बंद हो गया था। दिल्ली से कोई मिलने भी नहीं आता था। वह अलग-थलग पड़ गया था और विलासिता और शराब में डूबा रहने लगा। धीरे-धीरे उसके शरीर कमजोर पड़ने लगा।  (स्रोत-Bahadur Shah Jafar and War of 1857 in Delhi)
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Prayagraj News : मुगल बादशाह अकबर। - फोटो : प्रयागराज
विलियम स्लीमैन गया था मिलने

सन् 1816 मे सर विलियम हेनरी स्लीमैन (तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड हेस्टिंग्स का एजेंट जिसने बाद में देश के उत्तरी और उत्तर मध्य इलाके में ठगों के खिलाफ अभियान चलाया और हजारों ठगों को फांसी पर लटकाया था। ये ठग अंग्रेज लोगों को लूटने के बाद गला दबाकर उनकी हत्या कर लाश गायब कर देते थे।) ने खुसरोबाग जाकर जहांगीर से मुलाकात की। स्लीमैन ने उसकी हालत देखी। फिर गवर्नर जनरल को इसकी जानकारी दी। गवर्नर जनरल ने उसे अपने बंगले (अब मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज का प्रशासनिक भवन) बुलवाया। गर्मी के दिन चल रहे थे।

मिर्जा जहांगीर के बाल बिखरे हुए थे, कपड़े गंदे थे, एक लंबी टोपी लगाए हुए था, नीली सदरी और उसके ऊपर लंबा नक्काशीदार रत्नजड़ित जामा, जिसके डोर खुले थे। विक्षिप्त और लावारिस जैसा हुलिया। जब इसे दिल्ली से खुसरोबाग लाया गया था तो बेहद आकर्षक व्यक्तित्व, गठीला शरीर और चेहरे पर सुखद मुस्कान थी। हेस्टिंग्स ने उससे शराब की मात्रा कम करने को कहा। शहजादा से उसने वादा भी कराया।  फिर हेस्टिंग्स ने आदेश दिया कि शहजादा को प्रतिदिन एक बोतल से ज्यादा शराब नहीं दी जाए। उसे उस समय की सबसे कीमती मानी जाने वाली शराब हाफमैन्स चेरी ब्रान्डी दी जाती थी।

मिर्जा जहांगीर बीमार रहने लगा और उसकी तीनों बेगमें हलीमा उन निसा, ब्रज बाई, उमराव बाई उससे यदा-कदा मिलने आती रहीं। तीनों से उसके तीन बेटे और दो बेटियां हुईं। काफी इलाज के बाद भी उसकी दशा नहीं सुधरी और 18 जुलाई 1821 को खुसरोबाग में ही मात्र 45 साल की उम्र में उसका इंतकाल हो गया। कंपनी के अधिंकारियों ने उसे खुसरोबाग में ही दफन करने की तैयारी की थी। बाद में बादशाह के आदेश पर शव दिल्ली ले जाया गया और निजामुद्दीन दरगाह के पास ही सुपुर्दे खाक किया।

टर्र के मेले की शुरुआत की थी

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. एनआर फारुकी बताते हैं कि मिर्जा जहांगीर जब खुसरोबाग में कैद था, तो वह दक्षिणी गेट से अक्सर शहर की मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में जाता था और कुलीन लोगों के बीच दावत खाता था। वह ईद के दिन सबसे मिलता था। उसने ईद के अगले दिन लगने वाले टर्र के मेले की शुरुआत की थी। यह मेला मंसूर अली पार्क में अब भी लगता है। उसकी इच्छा थी कि इस मेले में हर वर्ग के लोग शामिल हों और सद्भाव का माहौल बनाएं। ईद के अगले दिन लगने वाले मेले को टर कहा जाता है। यहां टर से टर्र कब से कहा जाने लगा, इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। हो सकता है कि टर्र अपभ्रंश हो। वैसे टर के कई अर्थ हैं, इनमें एक है जोर-जोर से बोलना।
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