पैतृक आवास रानी मंडी वाली कोठी इशरत मंजिल कभी गुलजार रहा करती थी। अब वहां सिर्फ यादगारे हुसैनी इंटर कॉलेज है। इसमें उनकी किसी भी विरासत को सहेज कर नहीं रखा गया है। वहीं, उनकी मजार भी बदहाल स्थिति में है। जो काला डांडा कब्रिस्तान में है। यहां शबेरात पर भी कुछ चाहने वालों के सिवा परिवार का कोई भी शख्स चरागां के लिए नहीं जाता।
स्कूल के प्रबंधक गौहर काजमी कहते हैं कि अकबर इलाहाबाद के नाम से कोई खास कमरा नहीं है और न ही यहां उनसे जुड़ीं चीजें। हां, उनके नाम पर एक हॉल का नामकरण किया गया है। हालांकि, उन्होंने पहली पत्नी के नहीं रहने पर दूसरी शादी की थी। दोनों पत्नियों से दो-दो संतानें हुईं। पूरी दुनिया से रिश्ता जोड़ने वाले अकबर अपने ही शहर में अनजान जैसे हो गए हैं।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो...
विद्रोही स्वभाव के शायर अकबर इलाहाबादी रूढ़िवादिता एवं धार्मिक ढोंग के सख्त खिलाफ थे। वह अपनी शायरी में इस पर तंज किया करते थे, कौम के गम में डिनर खाते हैं, हुक्काम के साथ, रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। अखबार की अहमियत पर कहा था, खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। उनकी सबसे मशहूर गजल शराब पर ही है, जिसे गुलाम अली ने गाकर अमर कर दिया है। ‘हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है/डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।’
इशरत मंजिल की तर्ज पर रखा गया था आनंद भवन का नाम
अकबर इलाहाबादी और मोतीलाल नेहरू बहुत अच्छे मित्र थे। जब मोती लाल नेहरू ने आनंद भवन खरीदा तो उन्होंने नाम के लिए सलाह ली तो अकबर ने कहा था कि मेरी इशरत मंजिल का तर्जुमा (अनुवाद) कर दें, जिसका अर्थ था कि ऐसा भवन जहां आनंद हो। वहीं, आनंद भवन का नाम मिल गया।