जनहित याचिका में आगे कहा गया है कि जून 2013 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों और आयुक्तों को एक आदेश जारी किया, जिसमें जाति प्रमाण पत्र के लिए पात्र विमुक्त जनजातियों को विमुक्त जनजाति (विमुक्त जाति) के रूप में सूचीबद्ध किया गया। इसमें विशेष रूप से विमुक्त जनजातियों (ख) के तहत सीरियल नंबर 07 पर ''भाट'' समुदाय को शामिल किया गया।
हालांकि राज्य सरकार ने जून 2013 के आदेश में भाट समुदाय को विमुक्त जनजाति/विमुक्त जाति के रूप में मान्यता दी थी और उन्हें एससी/एसटी श्रेणी में स्वीकार करते हुए जाति प्रमाण पत्र जारी किए थे। इसके बावजूद, भाट समुदाय को सार्वजनिक रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में लाभ नहीं मिले हैं। जनहित याचिका में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने भी समय-समय पर विभिन्न जातियों का वर्गीकरण किया है, लेकिन भाट जाति को अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी जनहित याचिका में कहा है कि अन्य विमुक्त जनजातियां बंजारा, भर, गंदीला, मल्लाह, केवट, मेवाती, नट, गूजर, गोंड, भोटिया, बुक्सा, जन्नसरी को यूपी के विभिन्न जिलों में ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत रखा गया है, उन्हें सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में आरक्षण का लाभ मिल रहा है।