पढ़ाई के लिए 39 साल पहले रूस गए रामेश्वर सिंह ने वहां हिंदी का पूरा कुनबा खड़ा कर दिया है। अपनी भाषा के प्रचार का माध्यम उन्होंने बनाया रामलीला को। कभी सोवियत यूनियन के रामलीला में भगवान राम का किरदार निभाने वाले पद्मश्री गिनादी पेचनीकोव की स्मृति में उन्होंने वहां रामलीला शुरू की है। उनकी रूसी पत्नी और बच्चे तो हिंदी बोलते ही हैं, रामलीला के रूसी पात्र भी हिंदी बोलना और लिखना सीख गए हैं।
सुल्तानपुर के सहतपुर गांव निवासी रामेश्वर की रामलीला मंडली पद्मश्री गेनादिपेचनीकोव मेमोरियल दिशा रामलीला मास्को एनसीजेडसीसी प्रयागराज से जुड़ी है। एनसीजेडसीसी के आमंत्रण पर मास्को की यह लीला मंडली यहां मंचन के लिए आ भी चुकी है। यह मंडली रामलीला के साथ ही कृष्ण लीला का मास्को और अन्य शहरों में मंचन कर लोकप्रियता बटोर रही है।
1982 में उच्चशिक्षा के लिए मास्को गए रामेश्वर सिंह ने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। उसी दौरान उसको रूसी युवती नादेज्दा से प्यार हो गया। नजदीकियां इस कदर बढ़ीं कि 1989 में वह हमेशा के लिए नादेज्दा के होकर रह गए। मास्को में घर बसाने के बाद रामेश्वर अपनी भाषा, संस्कृति से जुड़े रहे। रामेश्वर के हिंदी प्रेम का ही नतीजा था कि उनकी पत्नी नादेज्दा को भी हिंदी सीखनी पड़ी।
अब उनके इकलौते पुत्र और पुत्री दोनों हिंदी न सिर्फ बोलते हैं, बल्कि लिखते और पढ़ते भी हैं। खासतौर से रूस में हिंदी की जमीन बनाने और अपनी भाषा का प्रचार के लिए उन्होंने हिंदी मंडल की भी स्थापना की है। हिंदी मंडल से सैकड़ों कलाकार, कवि और लेखक जुड़े हुए हैं। इनमें प्रो लुडमिला खोखलोवा के अलावा मास्को स्टेल विश्वविद्यालय के हिंदी शिक्षक जुड़े हैं। इनके अलावा रूसी रामलीला से जुड़े गुलेल स्ट्रेक्लोवा, अन्ना चेलनोकोवा, पानिना और कोस्टीना भी हिंदी सीख चुकी हैं।
वर्षों बाद मैंने रूस में पद्मश्री पोचनीकोव की याद में रामलीला शुरू की। यह रामलीला हिंदी के प्रचार का आसान माध्यम बन गई है। लीला के पात्र हिंदी में भी संवाद करते हैं। इसके लिए हिंदी के प्रचार के लिए हिंदी मंडल की भी रूस में स्थापना की गई है।
डॉ रामेश्वर सिंह, निर्देशक-पद्मश्री गिनादी पेचनीकोव स्मृति रामलीला मास्को।